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मशरूम की खेती, कम लागत में अधिक लाभकारी विकल्प, जानिए कैसे करें

मोना कुमारी (कृषि स्नातक चतुर्थ बर्ष छात्रा)
संदीप कुमार शर्मा (कृषि मौसम वैज्ञानिक)
डॉ संजय सिंह (वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी)
जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र रीवा (म.प्र.)

बढ़ती जनसंख्या, घटती कृषि भूमि और बेरोजगारी की समस्या के बीच मशरूम की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प के रूप में उभर रही है। यह एक ऐसी कृषि गतिविधि है जिसे बहुत कम स्थान, कम समय और न्यूनतम लागत में अपनाया जा सकता है। मशरूम न केवल पोषण से भरपूर होता है, बल्कि यह कृषि अवशेषों का सदुपयोग कर किसानों की अतिरिक्त आय का स्रोत भी बनता है।

मशरूम का पोषण एवं औषधीय महत्व

मशरूम को “वनस्पति मांस” कहा जाता है क्योंकि इसमें उच्च मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन-B, विटामिन-D, आयरन, कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा फाइबर प्रचुर मात्रा में होते हैं। यह मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप तथा मोटापे से ग्रसित व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। कम वसा और कोलेस्ट्रॉल रहित होने के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।

मशरूम की प्रमुख किस्में

भारत में मुख्यतः तीन प्रकार के मशरूम उगाए जाते हैं—
बटन मशरूम, ऑयस्टर मशरूम (ढिंगरी) और पैडी स्ट्रॉ मशरूम।

बटन मशरूम – ठंडी जलवायु में उपयुक्त

ऑयस्टर मशरूम (ढिंगरी) – गर्म व समशीतोष्ण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त
पैडी स्ट्रॉ मशरूम – अधिक तापमान में उगाया जाता है
इनमें ऑयस्टर मशरूम की खेती सबसे सरल मानी जाती है क्योंकि यह सामान्य तापमान पर उगाया जा सकता है और इसमें लागत भी कम आती है।

उपयुक्त जलवायु एवं स्थान

मशरूम की खेती के लिए खेत की आवश्यकता नहीं होती। 
इसे घर के किसी खाली कमरे, झोपड़ी या शेड में भी उगाया जा सकता है। 

तापमान: 20–30°C
आर्द्रता: 70–80%
 उपयुक्त मानी जाती है।

हवादार एवं स्वच्छ स्थान आवश्यक
ऑयस्टर मशरूम वर्ष भर उगाया जा सकता है, जबकि बटन मशरूम मुख्यतः सर्दियों में उगाया जाता है।

 स्थान हवादार, साफ-सुथरा और सीधी धूप से सुरक्षित होना चाहिए

उत्पादन विधि

  1. मशरूम उत्पादन हेतु कच्चा माल
    भूसा (गेहूँ या धान का)
    उच्च गुणवत्ता वाला स्पॉन (बीज)
    प्लास्टिक की थैलियाँ
    साफ पानी
    फॉर्मेलिन या ब्लीचिंग पाउडर (कीटाणुशोधन हेतु)
  2. सब्सट्रेट (भूसा) की तैयारी
    भूसे को 2–3 सेमी के टुकड़ों में काट लें।
    साफ पानी में 8–10 घंटे तक भिगो दें।
    बाद में अतिरिक्त पानी निथार दें।
    कीटाणुशोधन हेतु भूसे को हल्के फॉर्मेलिन या गर्म पानी से उपचारित करें।
  3. सब्सट्रेट (भूसा) की रासायनिक तैयारी
    (A) भिगोना एवं कीटाणुशोधन
    फॉर्मूला (प्रति 100 लीटर पानी):
    फॉर्मेलिन (40%) : 125 मिलीलीटर
    कार्बेन्डाजिम (Bavistin) : 7–10 ग्राम
    प्रक्रिया:
    भूसे को 8–10 घंटे इस घोल में भिगोएँ।
    बाद में भूसे को निकालकर अतिरिक्त पानी निथार दें।
    उपयोग से पहले 1–2 घंटे हवा लगने दें ताकि फॉर्मेलिन गैस उड़ जाए।
  4. pH संतुलन हेतु रसायन
    कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) : 1–2%
    जिप्सम (CaSO₄) : 1–2%
     उद्देश्य:-
    pH को 6.5–7.5 बनाए रखना
    भूसे को ढीला रखना
    मायसेलियम की तेज़ वृद्धि
  5. स्पॉनिंग (बीज मिश्रण)
    मात्रा:
    स्पॉन: सब्सट्रेट का 3–5%
    रासायनिक सावधानी:
    स्पॉनिंग से पहले हाथों को 0.1% ब्लीचिंग पाउडर या 70% अल्कोहल से साफ करें।
  6. स्पॉनिंग (बीज डालने की प्रक्रिया)
    तैयार भूसे को प्लास्टिक बैग में परतों में भरें।
    प्रत्येक परत पर थोड़ी मात्रा में स्पॉन डालें।
    बैग को ऊपर से बाँध दें और छोटे-छोटे छेद कर दें।
  7. ऊष्मायन (Incubation)
    स्पॉन किए गए बैग को अंधेरे, साफ और हवादार कमरे में रखें।
    10–15 दिनों में पूरा भूसा सफेद फफूँद (मायसेलियम) से भर जाता है।
  8. फलन (Fruiting) अवस्था
    बैग को हल्की रोशनी और नमी वाले स्थान पर रखें।
    नियमित रूप से पानी का छिड़काव करें।
    5–7 दिनों में मशरूम निकलने लगते हैं।
  9. कटाई (Harvesting)
    जब मशरूम पूरी तरह विकसित हो जाएँ, तब उन्हें हल्के हाथ से मोड़कर तोड़ लें।
    एक बैग से 2–3 बार उत्पादन लिया जा सकता है।

 देखभाल एवं प्रबंधन

मशरूम की खेती में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, केवल नमी बनाए रखने के लिए पानी का हल्का छिड़काव किया जाता है। कमरे की साफ-सफाई, तापमान और नमी पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है। गंदगी या अत्यधिक नमी से रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है।

 रोग एवं कीट नियंत्रण

मशरूम में मुख्यतः हरा फफूंद, काला फफूंद तथा मक्खियों की समस्या देखी जाती है। इनसे बचाव के लिए स्वच्छ वातावरण, शुद्ध स्पॉन का उपयोग तथा उचित तापमान बनाए रखना आवश्यक है। रासायनिक दवाओं का प्रयोग बहुत सीमित किया जाता है।

 मशरूम में रोग लगने के प्रमुख कारण
  • अशुद्ध या संक्रमित स्पॉन का प्रयोग
  • उत्पादन कक्ष की सफाई में कमी
  • अत्यधिक नमी या तापमान असंतुलन
  • कृषि अवशेषों का उचित उपचार न     होना
  • हवादार व्यवस्था का अभाव
     
  1. हरा फफूंद रोग (Green Mold – Trichoderma)
    लक्षण :
    मशरूम बेड पर हरे रंग की परत दिखाई देती है। माइसीलियम का विकास रुक जाता है और उत्पादन बहुत कम हो जाता है।
    रोकथाम एवं बचाव :
    धान के पुआल/भूसे का उचित उबाल या भाप उपचार करें
    केवल प्रमाणित एवं ताजा स्पॉन का प्रयोग करें
    उत्पादन कक्ष में 2% फॉर्मेलिन या 1% ब्लीच से सफाई करें
    संक्रमित बैग को तुरंत हटा दें
  2. काला फफूंद रोग (Black Mold – Aspergillus)
    लक्षण :
    बेड पर काले धब्बे बन जाते हैं, दुर्गंध आती है और मशरूम का विकास रुक जाता है।

प्रबंधन :
नमी अधिक न होने दें
कमरे में वेंटिलेशन की उचित व्यवस्था रखें
अत्यधिक पानी छिड़काव से बचें

3.मक्खियाँ (Sciarid & Phorid Flies)
लक्षण :
मक्खियाँ अंडे देती हैं, जिससे लार्वा माइसीलियम को नुकसान पहुँचाते हैं।
नियंत्रण उपाय :
खिड़की-दरवाजों पर जाली लगाएँ
उत्पादन कक्ष के बाहर गंदगी न रखें
पीले चिपचिपे ट्रैप (Sticky traps) लगाएँ

4.नेमाटोड (सूक्ष्म कृमि)
लक्षण :
माइसीलियम कमजोर हो जाता है, बदबू आने लगती है।
प्रबंधन :
सब्सट्रेट का उबाल/भाप उपचार अनिवार्य करें
साफ पानी और स्वच्छ उपकरणों का प्रयोग करें

उत्पादन, आय एवं लाभ

मशरूम की खेती से कम समय में अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है। एक छोटे कमरे से भी 20–25 हजार रुपये प्रति माह तक की आय संभव है। यह खेती किसानों के साथ-साथ महिलाओं, युवाओं एवं स्वयं सहायता समूहों के लिए भी रोजगार का अच्छा साधन है।

मशरूम की खेती आधुनिक, टिकाऊ और लाभकारी कृषि प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि पोषण सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 उचित प्रशिक्षण और बाजार सुविधा उपलब्ध होने पर मशरूम खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बना सकती है।
मशरूम की खेती कम जमीन और कम लागत में होती है।

इसमें धान का पुआल और कृषि अपशिष्ट उपयोग होते हैं, जिससे कचरा भी कम होता है

यह पोषण से भरपूर होने के कारण स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है

किसान, महिलाएँ और युवा इसे स्वरोजगार के रूप में अपना सकते हैं।

कम समय (30–40 दिन) में फसल तैयार होने से तेज़ आय संभव है।

मशरूम की खेती, कम लागत में अधिक लाभकारी विकल्प, जानिए कैसे करें

मोना कुमारी (कृषि स्नातक चतुर्थ बर्ष छात्रा)
संदीप कुमार शर्मा (कृषि मौसम वैज्ञानिक)
डॉ संजय सिंह (वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी)
जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र रीवा (म.प्र.)

बढ़ती जनसंख्या, घटती कृषि भूमि और बेरोजगारी की समस्या के बीच मशरूम की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प के रूप में उभर रही है। यह एक ऐसी कृषि गतिविधि है जिसे बहुत कम स्थान, कम समय और न्यूनतम लागत में अपनाया जा सकता है। मशरूम न केवल पोषण से भरपूर होता है, बल्कि यह कृषि अवशेषों का सदुपयोग कर किसानों की अतिरिक्त आय का स्रोत भी बनता है।

मशरूम का पोषण एवं औषधीय महत्व

मशरूम को “वनस्पति मांस” कहा जाता है क्योंकि इसमें उच्च मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन-B, विटामिन-D, आयरन, कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा फाइबर प्रचुर मात्रा में होते हैं। यह मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप तथा मोटापे से ग्रसित व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। कम वसा और कोलेस्ट्रॉल रहित होने के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।

मशरूम की प्रमुख किस्में

भारत में मुख्यतः तीन प्रकार के मशरूम उगाए जाते हैं—
बटन मशरूम, ऑयस्टर मशरूम (ढिंगरी) और पैडी स्ट्रॉ मशरूम।

बटन मशरूम – ठंडी जलवायु में उपयुक्त

ऑयस्टर मशरूम (ढिंगरी) – गर्म व समशीतोष्ण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त
पैडी स्ट्रॉ मशरूम – अधिक तापमान में उगाया जाता है
इनमें ऑयस्टर मशरूम की खेती सबसे सरल मानी जाती है क्योंकि यह सामान्य तापमान पर उगाया जा सकता है और इसमें लागत भी कम आती है।

उपयुक्त जलवायु एवं स्थान

मशरूम की खेती के लिए खेत की आवश्यकता नहीं होती। 
इसे घर के किसी खाली कमरे, झोपड़ी या शेड में भी उगाया जा सकता है। 

तापमान: 20–30°C
आर्द्रता: 70–80%
 उपयुक्त मानी जाती है।

हवादार एवं स्वच्छ स्थान आवश्यक
ऑयस्टर मशरूम वर्ष भर उगाया जा सकता है, जबकि बटन मशरूम मुख्यतः सर्दियों में उगाया जाता है।

 स्थान हवादार, साफ-सुथरा और सीधी धूप से सुरक्षित होना चाहिए

उत्पादन विधि

  1. मशरूम उत्पादन हेतु कच्चा माल
    भूसा (गेहूँ या धान का)
    उच्च गुणवत्ता वाला स्पॉन (बीज)
    प्लास्टिक की थैलियाँ
    साफ पानी
    फॉर्मेलिन या ब्लीचिंग पाउडर (कीटाणुशोधन हेतु)
  2. सब्सट्रेट (भूसा) की तैयारी
    भूसे को 2–3 सेमी के टुकड़ों में काट लें।
    साफ पानी में 8–10 घंटे तक भिगो दें।
    बाद में अतिरिक्त पानी निथार दें।
    कीटाणुशोधन हेतु भूसे को हल्के फॉर्मेलिन या गर्म पानी से उपचारित करें।
  3. सब्सट्रेट (भूसा) की रासायनिक तैयारी
    (A) भिगोना एवं कीटाणुशोधन
    फॉर्मूला (प्रति 100 लीटर पानी):
    फॉर्मेलिन (40%) : 125 मिलीलीटर
    कार्बेन्डाजिम (Bavistin) : 7–10 ग्राम
    प्रक्रिया:
    भूसे को 8–10 घंटे इस घोल में भिगोएँ।
    बाद में भूसे को निकालकर अतिरिक्त पानी निथार दें।
    उपयोग से पहले 1–2 घंटे हवा लगने दें ताकि फॉर्मेलिन गैस उड़ जाए।
  4. pH संतुलन हेतु रसायन
    कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) : 1–2%
    जिप्सम (CaSO₄) : 1–2%
     उद्देश्य:-
    pH को 6.5–7.5 बनाए रखना
    भूसे को ढीला रखना
    मायसेलियम की तेज़ वृद्धि
  5. स्पॉनिंग (बीज मिश्रण)
    मात्रा:
    स्पॉन: सब्सट्रेट का 3–5%
    रासायनिक सावधानी:
    स्पॉनिंग से पहले हाथों को 0.1% ब्लीचिंग पाउडर या 70% अल्कोहल से साफ करें।
  6. स्पॉनिंग (बीज डालने की प्रक्रिया)
    तैयार भूसे को प्लास्टिक बैग में परतों में भरें।
    प्रत्येक परत पर थोड़ी मात्रा में स्पॉन डालें।
    बैग को ऊपर से बाँध दें और छोटे-छोटे छेद कर दें।
  7. ऊष्मायन (Incubation)
    स्पॉन किए गए बैग को अंधेरे, साफ और हवादार कमरे में रखें।
    10–15 दिनों में पूरा भूसा सफेद फफूँद (मायसेलियम) से भर जाता है।
  8. फलन (Fruiting) अवस्था
    बैग को हल्की रोशनी और नमी वाले स्थान पर रखें।
    नियमित रूप से पानी का छिड़काव करें।
    5–7 दिनों में मशरूम निकलने लगते हैं।
  9. कटाई (Harvesting)
    जब मशरूम पूरी तरह विकसित हो जाएँ, तब उन्हें हल्के हाथ से मोड़कर तोड़ लें।
    एक बैग से 2–3 बार उत्पादन लिया जा सकता है।

 देखभाल एवं प्रबंधन

मशरूम की खेती में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, केवल नमी बनाए रखने के लिए पानी का हल्का छिड़काव किया जाता है। कमरे की साफ-सफाई, तापमान और नमी पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है। गंदगी या अत्यधिक नमी से रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है।

 रोग एवं कीट नियंत्रण

मशरूम में मुख्यतः हरा फफूंद, काला फफूंद तथा मक्खियों की समस्या देखी जाती है। इनसे बचाव के लिए स्वच्छ वातावरण, शुद्ध स्पॉन का उपयोग तथा उचित तापमान बनाए रखना आवश्यक है। रासायनिक दवाओं का प्रयोग बहुत सीमित किया जाता है।

 मशरूम में रोग लगने के प्रमुख कारण
  • अशुद्ध या संक्रमित स्पॉन का प्रयोग
  • उत्पादन कक्ष की सफाई में कमी
  • अत्यधिक नमी या तापमान असंतुलन
  • कृषि अवशेषों का उचित उपचार न     होना
  • हवादार व्यवस्था का अभाव
     
  1. हरा फफूंद रोग (Green Mold – Trichoderma)
    लक्षण :
    मशरूम बेड पर हरे रंग की परत दिखाई देती है। माइसीलियम का विकास रुक जाता है और उत्पादन बहुत कम हो जाता है।
    रोकथाम एवं बचाव :
    धान के पुआल/भूसे का उचित उबाल या भाप उपचार करें
    केवल प्रमाणित एवं ताजा स्पॉन का प्रयोग करें
    उत्पादन कक्ष में 2% फॉर्मेलिन या 1% ब्लीच से सफाई करें
    संक्रमित बैग को तुरंत हटा दें
  2. काला फफूंद रोग (Black Mold – Aspergillus)
    लक्षण :
    बेड पर काले धब्बे बन जाते हैं, दुर्गंध आती है और मशरूम का विकास रुक जाता है।

प्रबंधन :
नमी अधिक न होने दें
कमरे में वेंटिलेशन की उचित व्यवस्था रखें
अत्यधिक पानी छिड़काव से बचें

3.मक्खियाँ (Sciarid & Phorid Flies)
लक्षण :
मक्खियाँ अंडे देती हैं, जिससे लार्वा माइसीलियम को नुकसान पहुँचाते हैं।
नियंत्रण उपाय :
खिड़की-दरवाजों पर जाली लगाएँ
उत्पादन कक्ष के बाहर गंदगी न रखें
पीले चिपचिपे ट्रैप (Sticky traps) लगाएँ

4.नेमाटोड (सूक्ष्म कृमि)
लक्षण :
माइसीलियम कमजोर हो जाता है, बदबू आने लगती है।
प्रबंधन :
सब्सट्रेट का उबाल/भाप उपचार अनिवार्य करें
साफ पानी और स्वच्छ उपकरणों का प्रयोग करें

उत्पादन, आय एवं लाभ

मशरूम की खेती से कम समय में अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है। एक छोटे कमरे से भी 20–25 हजार रुपये प्रति माह तक की आय संभव है। यह खेती किसानों के साथ-साथ महिलाओं, युवाओं एवं स्वयं सहायता समूहों के लिए भी रोजगार का अच्छा साधन है।

मशरूम की खेती आधुनिक, टिकाऊ और लाभकारी कृषि प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि पोषण सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 उचित प्रशिक्षण और बाजार सुविधा उपलब्ध होने पर मशरूम खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बना सकती है।
मशरूम की खेती कम जमीन और कम लागत में होती है।

इसमें धान का पुआल और कृषि अपशिष्ट उपयोग होते हैं, जिससे कचरा भी कम होता है

यह पोषण से भरपूर होने के कारण स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है

किसान, महिलाएँ और युवा इसे स्वरोजगार के रूप में अपना सकते हैं।

कम समय (30–40 दिन) में फसल तैयार होने से तेज़ आय संभव है।

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