पूजा रानी (कृषि स्नातक चतुर्थ बर्ष छात्रा)
संदीप कुमार शर्मा (कृषि मौसम वैज्ञानिक)
डॉ संजय सिंह (वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी)
स्ट्रॉबेरी एक लोकप्रिय, स्वादिष्ट और पोषक तत्वों से भरपूर फल है। इसका वैज्ञानिक नाम Fragaria × ananassa है। यह फल अपने आकर्षक लाल रंग, मीठे-खट्टे स्वाद और सुगंध के कारण बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को पसंद आता है। स्ट्रॉबेरी का उपयोग ताजे फल के रूप में तथा जैम, जेली, आइसक्रीम, केक, मिल्कशेक और अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों में किया जाता है।स्ट्रॉबेरी की उत्पत्ति यूरोप और अमेरिका मानी जाती है। वर्तमान समय में इसकी खेती विश्व के कई देशों में की जाती है। भारत में स्ट्रॉबेरी की खेती मुख्यतः महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक और कुछ अन्य राज्यों में की जा रही है|स्ट्रॉबेरी एक छोटा, बहुवर्षीय शाकीय पौधा है। इसके पत्ते हरे और फूल सफेद रंग के होते हैं। फल जमीन के पास उगते हैं और पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं।
स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए मिट्टी
मिट्टी
स्ट्रॉबेरी की सफल खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी का चयन बहुत महत्वपूर्ण है। हल्की दोमट (Loamy) या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है।खेत में पानी रुकने की समस्या नहीं होनी चाहिए, क्योंकि जलभराव से जड़ सड़न का खतरा रहता है।मिट्टी में जैविक पदार्थ (Organic matter) की मात्रा अधिक होनी चाहिए| मिट्टी का pH 5.5 से 6.5 के बीच सर्वोत्तम होता है। अच्छी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनाना चाहिए और सड़ी हुई गोबर की खाद मिलानी चाहिए।
जलवायु
स्ट्रॉबेरी मुख्यतः ठंडी और समशीतोष्ण जलवायु की फसल है।फूल और फल बनने के समय 15°C से 25°C तापमान अनुकूल रहता है।पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए हल्की ठंड आवश्यक होती है।अधिक तापमान से फल छोटे और गुणवत्ता में कम हो जाते हैं|अत्यधिक पाला फूलों और फलों को नुकसान पहुँचा सकता है।अच्छी पैदावार के लिए पर्याप्त धूप आवश्यक होती है।
स्ट्रॉबेरी के लिए खेत तैयार करें
दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी रहती है। खेत में पानी रुकता न हो| 2–3 गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें। बाद में 2 हल्की जुताई/हैरो चलाकर मिट्टी भुरभुरी, सभी ढेले तोड़कर खेत समतल कर लें। स्ट्रॉबेरी के लिए क्यारी चौड़ाई: 60–80 सेमी, ऊँचाई: 20–25 सेमी, क्यारियों के बीच दूरी: 40–50 सेमी ➡️ पानी भराव से बचाव होता है। क्यारी बनाते समय ही ड्रिप पाइप बिछा दें। पानी की बचत होती है और रोग कम लगते हैं। ट्राइकोडर्मा 2–3 किग्रा/एकड़ को FYM में मिलाकर खेत में डालें। 5–7 दिन तक क्यारियाँ खुली छोड़ दें। रोपाई से पहले हल्की सिंचाई करें। मिट्टी भुरभुरी व नम होनी चाहिए।
लोकप्रिय किस्में और उनकी विशेषताएँ:
चैंडलर
चैंडलर भारत में सबसे अधिक उगाई जाने वाली स्ट्रॉबेरी किस्म है। इसके फल मध्यम से बड़े आकार के, चमकीले लाल रंग के और स्वाद में मीठे होते हैं। इसकी पैदावार अच्छी होती है और फल आकार में एकसमान मिलते हैं। यह किस्म ताज़ा बिक्री और प्रोसेसिंग दोनों के लिए उपयुक्त मानी जाती है तथा मध्य प्रदेश की जलवायु में अच्छा उत्पादन देती है।
स्वीट चार्ली
स्वीट चार्ली एक जल्दी पकने वाली किस्म है, जो सीजन की शुरुआत में ही फल देना शुरू कर देती है। इसके फल मध्यम आकार के, बहुत मीठे और रसदार होते हैं। इसकी शेल्फ लाइफ कम होती है, इसलिए यह स्थानीय बाजारों के लिए अधिक लाभदायक रहती है।
कैमरोसा
कैमरोसा किस्म के फल बड़े, गहरे लाल रंग के और मजबूत होते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि फल परिवहन के दौरान कम खराब होते हैं। यह किस्म व्यावसायिक खेती, दूर के बाजार और प्रोसेसिंग के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
फेस्टिवल
फेस्टिवल किस्म के फल चमकीले रंग के, रसदार और स्वाद में हल्के मीठे-खट्टे होते हैं। इसके फल जूस और जैम बनाने के लिए अच्छे माने जाते हैं। इस किस्म में कुछ रोगों के प्रति सहनशीलता भी पाई जाती है।
एल्बियन
एल्बियन डे-न्यूट्रल किस्म है, यानी यह दिन की लंबाई पर निर्भर नहीं रहती और लंबे समय तक फल देती है। इसके फल बड़े, गहरे लाल रंग के और स्वाद में मीठे होते हैं। इसकी शेल्फ लाइफ अच्छी होती है, इसलिए प्रीमियम बाजार में इसकी मांग रहती है।
सेल्वा
सेल्वा भी डे-न्यूट्रल किस्म है और लगातार फल देने की क्षमता रखती है। इसके फल मध्यम से बड़े आकार के, लाल रंग के और स्वाद में अच्छे होते हैं। यह किस्म लंबी अवधि तक उत्पादन देने के लिए जानी जाती है।
पाजारो
पाजारो किस्म के फल मध्यम आकार के, मजबूत और स्वाद में संतुलित होते हैं। यह किस्म ताज़ा उपयोग के साथ-साथ प्रोसेसिंग उद्योग के लिए भी उपयुक्त है। इसमें कुछ रोगों के प्रति सहनशीलता पाई जाती है।
बेलरूबी
बेलरूबी किस्म के फल बड़े, लाल रंग के और स्वाद में हल्के मीठे-खट्टे होते हैं। यह किस्म फरवरी-मार्च के समय अच्छा उत्पादन देती है और प्रोसेसिंग के लिए भी उपयोगी मानी जाती है।
फर्न (Fern)
फर्न-
एक जल्दी पकने वाली किस्म है, जिसके फल मध्यम से बड़े आकार के और मीठे होते हैं। यह किस्म शुरुआती सीजन में बाजार में फल लाने के लिए उपयोगी रहती है।
पूसा अर्ली ड्वार्फ
पूसा अर्ली ड्वार्फ भारत में विकसित किस्म है। इसके पौधे छोटे आकार के होते हैं और जल्दी फूल व फल देते हैं। यह किस्म स्थानीय परिस्थितियों में अच्छी तरह अनुकूल हो जाती है और छोटे किसानों के लिए उपयोगी मानी जाती है।
बुवाई का सही समय और जलवायु:
स्ट्रॉबेरी लगाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य (15 अक्टूबर से 15 नवंबर) तक होता है, जब तापमान 15°C से 30°C के बीच हो, क्योंकि ठंडी जलवायु (15-25°C) पौधे के विकास और फल लगने के लिए आदर्श है, और इसके लिए हल्की, भुरभुरी, अच्छे जल-निकासी वाली दोमट मिट्टी और अच्छी धूप (6-8 घंटे) की आवश्यकता होती है, साथ ही मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई से बेहतर उपज मिलती है|
बीज दर (पौधे की संख्या) एवं बुवाई (रोपाई) का तरीका:
स्ट्रॉबेरी में सामान्य बीज की बजाय स्वस्थ रनर/पौध का उपयोग किया जाता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए लगभग 40,000 से 50,000 स्वस्थ पौधों की आवश्यकता होती है। पौध हमेशा प्रमाणित नर्सरी से रोग-मुक्त और एकसमान आकार की लेनी चाहिए, जिससे खेत में एकरूप वृद्धि और अधिक उत्पादन प्राप्त हो।स्ट्रॉबेरी की खेती में प्रत्यक्ष बुवाई नहीं की जाती, बल्कि पौधों की रोपाई की जाती है। रोपाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई कर मिट्टी भुरभुरी बनाई जाती है। इसके बाद 15–20 सेमी ऊँची उठी हुई क्यारियाँ तैयार की जाती हैं।
प्लास्टिक मल्च बिछाने के बाद उसमें निर्धारित दूरी पर छेद कर पौधों की रोपाई की जाती है। रोपाई करते समय ध्यान रखें कि पौधे का क्राउन (मध्य भाग) मिट्टी की सतह के बराबर रहे, बहुत अधिक दबाने या ऊपर रखने से पौधा खराब हो सकता है।पौधों की रोपाई सामान्यतः 30×30 सेमी या 45×30 सेमी दूरी पर की जाती है। रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना आवश्यक होता है, जिससे पौधे अच्छी तरह स्थापित हो सकें।
खाद व उर्वरक :
स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए मिट्टी में भरपूर जैविक खाद (गोबर की खाद, कम्पोस्ट) मिलाएं, और रोपण से पहले या बाद में संतुलित NPK उर्वरक (जैसे 1-2-1 या 1-3-1 अनुपात) दें, जिसमें फास्फोरस और पोटेशियम अधिक हो, साथ ही फूल आने से पहले बोरॉन, मैग्नीशियम और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिए यूरिया, जिंक सल्फेट और बोरिक एसिड के घोल का छिड़काव करें, जो फलों की गुणवत्ता और पैदावार बढ़ाते हैं।
गोबर की खाद (FYM): रोपण से पहले 20 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाएं, यह मिट्टी की संरचना सुधारता है|
NPK: बुवाई से पहले 20-40-40 किग्रा/हेक्टेयर और वार्षिक रूप से 40 किग्रा फास्फोरस और 80 किग्रा पोटाश/हेक्टेयर दे सकते हैं|
स्ट्रॉबेरी की सिंचाई कब करें:
स्ट्रॉबेरी की खेती में सिंचाई रोपण के तुरंत बाद शुरू होती है और फसल की अवस्था (स्थापना, फूलना, फलना) और मौसम के अनुसार समय व मात्रा बदलती है; आमतौर पर प्रति सप्ताह 1-2 इंच पानी चाहिए होता है, जिसे ड्रिप या फव्वारा विधि से सुबह के समय देना बेहतर है, खासकर फल आने पर ड्रिप सिंचाई ज़्यादा फायदेमंद है, ताकि फंगल रोगों से बचा जा सके और मिट्टी की नमी बनी रहे, क्योंकि यह फसल ठंडे मौसम की है और ज़्यादा पानी के बजाय लगातार नमी पसंद करती है।
खरपतवार नियंत्रण :
घास के लिए: सेथोक्सीडिम, क्लेथोडिम।
चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार और अन्य के लिए: क्लोपायरालिड ,फ्लूमियोक्साज़ि, ग्लाइफोसेटकेवल बहुत सावधानी से और परिरक्षित स्प्रेयर से करें। लेकिन रसायनों का प्रयोग हमेशा लेबल निर्देशों और सावधानी के साथ करें, खासकर कटाई के समय के आसपास, क्योंकि कई रसायन फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
कटाई का सही समय:
स्ट्रॉबेरी की कटाई का समय किस्म और जलवायु पर निर्भर करता है, लेकिन आमतौर पर बसंत के अंत (अप्रैल-मई) से गर्मियों (जून-जुलाई) के मध्य तक चलता है, जब फल पूरी तरह लाल और पके हुए हों, और कटाई सुबह के ठंडे समय में की जाती है, तने के साथ तोड़ने से ताजगी बनी रहती है।फल को कुचलने से बचाने के लिए, फल के ठीक ऊपर से एक छोटा तना (डंठल) लगा रहने दें और फिर तोड़ें या काटें।
उपज प्राप्ति:
आमतौर पर यह 15 से 25 टन (15,000-25,000 किलोग्राम) प्रति हेक्टेयर होती है, जबकि उन्नत तकनीकों (जैसे ग्रीनहाउस/हाइड्रोपोनिक्स) से यह 30 से 60 टन प्रति हेक्टेयर तक जा सकती है|
कुल अनुमानित लागत – 9,00,000 रुपए प्रति हेक्टेयर
उपज – 20-27 हजार किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
बाजार मूल्य – 180-300 प्रति किलोग्राम
कुल आमदनी – 52.8 लाख
शुद्ध आय – 42-43 लाख प्रति हेक्टेयर




