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वैज्ञानिकों की नई खोज आलू की फसल को झुलसा रोग से बचाएगी 

अयोध्या, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, अयोध्या के वैज्ञानिकों ने जीवाणु की मदद से कल्चर तैयार किया है, जो झुलसा रोग से आलू की फसल को बचाएगा। आलू की खेती करने वाले किसानों को अब झुलसा रोग को लेकर चि‍ंतित होने की जरूरत नहीं है। इसके इलाज के लिए जीवाणु बैसिलस सेरियस को खोज लिया गया है। इस जीवाणु कल्चर से तैयार जैविक खाद के प्रयोग से झुलसा रोग का प्रभाव आसानी से खत्म किया जा सकेगा।

इस कल्चर को विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉ आदेश कुमार ने बताया कि आलू की अगेती खेती करने वाले किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान अगेती झुलसा रोग से उठाना पड़ता है। कई बार तों पचास प्रतिशत तक फसल झुलसा रोग की वजह से बर्बाद हो जाती है। झुलसा रोग से फसल बचाने के लिए हमने यह बैक्टीरिया कल्चर तैयार किया है, जिसकी मदद से फसल को बचाया जा सकता है। 

आलू की खेती करने वाले किसानों को सबसे अधिक नुकसान झुलसा रोग से उठाना पड़ता है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दवा विकसित कर रहे हैं, जिसके मदद से किसानों को झुलसा रोग से छुटकारा मिल जाएगा।आलू की फसल में अगेती झुलसा रोग अल्टरनेरिया सोलेनाई नाम के कवक के कारण होता है। इसका लक्षण बुवाई के 3 से 4 सप्ताह बाद नजर आने लगते हैं। पौधों की निचली पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे उभरने लगते हैं। रोग बढ़ने के साथ धब्बों के आकार और रंग में भी वृद्धि होती है। रोग का प्रकोप बढ़ने पर पत्तियां सिकुड़ कर गिरने लगती हैं। तनों पर भी भूरे और काले धब्बे उभरने लगते हैं। आलू का आकार छोटा ही रह जाता है।

डॉ आदेश कुमार कहते हैं, “हमने मिट्टी से ही इस बैसिलस सीरियस बैक्टीरिया को निकाला और लैब में इसे झुलसा रोग फैलाने वाले फंगस के अगेंस्ट टेस्ट किया, हमने देखा कि 99 प्रतिशत तक यह झुलसा के खिलाफ कारगर है। उसके बाद भी हमने कई टेस्ट किये जिसका बहुत अच्छा रिजल्ट मिला। हमने इस बैक्टीरिया कल्चर को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव कल्चर संग्रह, मऊ में भेजा, जहां पर भी इस पर टेस्ट किए हैं, जोकि पूरी तरह से कारगर हैं।”

विश्वविद्यालय ने अभी तक इसका लैब में टेस्ट किया है जो पूरी तरह से कारगर रहा है, किसानों तक पहुंचने और व्यवसायिक रूप से उत्पादन होने तक अभी किसानों को इंतजार करना होगा। डॉ आदेश ने बताया कि यह कल्चर बहुत कारगर है, भविष्य में कोई कंपनी या फिर संस्थान, राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव कल्चर संग्रह, मऊ से संपर्क करके इसका व्यवसायिक स्तर पर उत्पादन कर सकता हैं। हमारे यहां विश्वविद्यालय में भी एक प्रोडक्शन लैब बन रही है, अगर वो भी अगले एक-दो साल में तैयार हो जाती है, यहां पर भी प्रोडक्शन शुरू हो सकता है, ताकि जल्द से जल्द किसानों तक इसे पहुंचाया जाए सके।”

किसान किस तरह से इसे फसल में उपयोग करेंगे या फिर किस अवस्था में यह किसानों तक पहुंचेगा इस बारे में डॉ आदेश कहते हैं, “अभी इस पर काम चल रहा है, लेकिन अगर इस कल्चर को हम स्प्रे की मदद से खेत में छिड़काव करते हैं तो यह ज्यादा फायदेमंद होगा। नहीं तो बुवाई से पहले मिट्टी का शोधन भी कर सकते हैं। इस पर अभी काम चल रहा है कि किस तरह से इसका उपयोग किया जा सकेगा।”

आलू में दो तरह के झुलसा रोग लगते हैं, एक अगेती झुलसा और दूसरा पछेती झुलसा रोग, यह बैक्टीरिया अगेती झुलसा के खिलाफ कारगर है।

वैज्ञानिकों की नई खोज आलू की फसल को झुलसा रोग से बचाएगी 

अयोध्या, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, अयोध्या के वैज्ञानिकों ने जीवाणु की मदद से कल्चर तैयार किया है, जो झुलसा रोग से आलू की फसल को बचाएगा। आलू की खेती करने वाले किसानों को अब झुलसा रोग को लेकर चि‍ंतित होने की जरूरत नहीं है। इसके इलाज के लिए जीवाणु बैसिलस सेरियस को खोज लिया गया है। इस जीवाणु कल्चर से तैयार जैविक खाद के प्रयोग से झुलसा रोग का प्रभाव आसानी से खत्म किया जा सकेगा।

इस कल्चर को विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉ आदेश कुमार ने बताया कि आलू की अगेती खेती करने वाले किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान अगेती झुलसा रोग से उठाना पड़ता है। कई बार तों पचास प्रतिशत तक फसल झुलसा रोग की वजह से बर्बाद हो जाती है। झुलसा रोग से फसल बचाने के लिए हमने यह बैक्टीरिया कल्चर तैयार किया है, जिसकी मदद से फसल को बचाया जा सकता है। 

आलू की खेती करने वाले किसानों को सबसे अधिक नुकसान झुलसा रोग से उठाना पड़ता है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दवा विकसित कर रहे हैं, जिसके मदद से किसानों को झुलसा रोग से छुटकारा मिल जाएगा।आलू की फसल में अगेती झुलसा रोग अल्टरनेरिया सोलेनाई नाम के कवक के कारण होता है। इसका लक्षण बुवाई के 3 से 4 सप्ताह बाद नजर आने लगते हैं। पौधों की निचली पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे उभरने लगते हैं। रोग बढ़ने के साथ धब्बों के आकार और रंग में भी वृद्धि होती है। रोग का प्रकोप बढ़ने पर पत्तियां सिकुड़ कर गिरने लगती हैं। तनों पर भी भूरे और काले धब्बे उभरने लगते हैं। आलू का आकार छोटा ही रह जाता है।

डॉ आदेश कुमार कहते हैं, “हमने मिट्टी से ही इस बैसिलस सीरियस बैक्टीरिया को निकाला और लैब में इसे झुलसा रोग फैलाने वाले फंगस के अगेंस्ट टेस्ट किया, हमने देखा कि 99 प्रतिशत तक यह झुलसा के खिलाफ कारगर है। उसके बाद भी हमने कई टेस्ट किये जिसका बहुत अच्छा रिजल्ट मिला। हमने इस बैक्टीरिया कल्चर को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव कल्चर संग्रह, मऊ में भेजा, जहां पर भी इस पर टेस्ट किए हैं, जोकि पूरी तरह से कारगर हैं।”

विश्वविद्यालय ने अभी तक इसका लैब में टेस्ट किया है जो पूरी तरह से कारगर रहा है, किसानों तक पहुंचने और व्यवसायिक रूप से उत्पादन होने तक अभी किसानों को इंतजार करना होगा। डॉ आदेश ने बताया कि यह कल्चर बहुत कारगर है, भविष्य में कोई कंपनी या फिर संस्थान, राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव कल्चर संग्रह, मऊ से संपर्क करके इसका व्यवसायिक स्तर पर उत्पादन कर सकता हैं। हमारे यहां विश्वविद्यालय में भी एक प्रोडक्शन लैब बन रही है, अगर वो भी अगले एक-दो साल में तैयार हो जाती है, यहां पर भी प्रोडक्शन शुरू हो सकता है, ताकि जल्द से जल्द किसानों तक इसे पहुंचाया जाए सके।”

किसान किस तरह से इसे फसल में उपयोग करेंगे या फिर किस अवस्था में यह किसानों तक पहुंचेगा इस बारे में डॉ आदेश कहते हैं, “अभी इस पर काम चल रहा है, लेकिन अगर इस कल्चर को हम स्प्रे की मदद से खेत में छिड़काव करते हैं तो यह ज्यादा फायदेमंद होगा। नहीं तो बुवाई से पहले मिट्टी का शोधन भी कर सकते हैं। इस पर अभी काम चल रहा है कि किस तरह से इसका उपयोग किया जा सकेगा।”

आलू में दो तरह के झुलसा रोग लगते हैं, एक अगेती झुलसा और दूसरा पछेती झुलसा रोग, यह बैक्टीरिया अगेती झुलसा के खिलाफ कारगर है।

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