भोपाल, आजकल किसान ज्यादा उपज के लेने चक्कर में खेती के पारंपरिक तरीकों को भूलकर केमिकल खेती पर आश्रित हो चुका है। केमिकल वाली खेती में उत्पादन तो बढ जाता है, लेकिन उत्पादित फसल सेहत को कितना नुकसान पहुंचा रही है इसका आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। सरकार द्वारा प्राकृतिक और जैविक खेती को बढावा देने के लिए चालाए जा रहे अभियान से लोगों किसानों में जागरूकता आ रही है और वो प्राकृतिक और जैविक खेती की तरफ बढ रहे हैं।
जैविक खेती किसानों को खेती में उनके खर्चे कम करने में तो मदद करती ही है साथ ही खेती को बचाने में ब्रह्मास्त्र और अग्नि अस्त्र जैसे हथियार भी देती है। जैविक खेती करते समय कीटों के प्रबंधन के लिए ब्रह्मास्त्र और अग्नि अस्त्र फार्मूले से जैविक दवाएं तैयार की जाती हैं। इसके साथ ही नाडेप तरीके से तैयार की गई खाद से उपज काफी अच्छी हो जाती है। इन उपायों को अपनाकर खेती करने पर फसल की गुणवत्ता काफी अच्छी रहेगी।
जानिए कृषि विज्ञान केंद्र टीकमगढ़ के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.एस. किरार डॉ. आर.के. प्रजापति एवं जयपाल छिगारहा के अनुसार ब्रम्हास्त्र बनाने और उपयोग करने के तरीके।
फसलों पर कीट से बचाव के लिए ब्रह्मास्त्र
फसलों पर कीट से बचाव के लिए ब्रह्मास्त्र बहुत फ़ायदेमंद होता है। ये बड़ी सूंडी, इल्लियों और अन्य कई तरह के कीटों पर नियंत्रण के लिए काम आता है।
ब्रह्मास्त्र बनाने की सामग्री:
10 लीटर गोमूत्र
3 किलोग्राम नीम की पत्ती
2 किलोग्राम करंज की पत्ती
2 किलोग्राम सीताफल की पत्ती
2 किलोग्राम बेल के पत्ते
2 किलोग्राम अरंडी की पत्ती
2 किलोग्राम धतूरा के पत्ते
ब्रह्मास्त्र को बनाने के लिए ऊपर दी गई सामग्रियों में से कोई भी पांच सामग्रियों का चयन करें। सभी पत्तियों को एक साथ अच्छे से पीस लें। इस मिश्रण को मिट्टी के बर्तन में डाल कर 20 लीटर पानी मिलाकर उबाल लें। जब चार उबाल आ जाए तो इसे उतारकर दो से तीन दिन छाया में ठंडा होने के लिए रख दें। इसके बाद इसमें गौमूत्र मिलायें और कपड़े से छानकर मिट्टी के बर्तन में स्टोर करने के लिए रख दें। इसे धूप से बचाना ज़रूरी है।
छह महीने तक कर सकते हैं ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल
ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल छह महीने तक कर सकते हैं। एक एकड़ ज़मीन के लिए 200 लीटर पानी में 7 से 10 लीटर ब्रह्मास्त्र मिला कर छिड़काव करना चाहिए।
पत्ती रोलर, तना/ फल/ फली बोरर के लिए उपयोगी
रासायनिक दवाओं का प्रयोग अंतिम/ आखिरी उपाय के तौर पर किसान भाइयों को अपनाना चाहिए । उर्द/सोयाबीन में पीला चितरी रोग के लिये प्रभावित पौधों को खेत से उखड कर एक गड्ढे में दबा देना चाहिए इस रोग के वाहक कीट सफ़ेद मक्खी के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोरोप्रिड दवा कि 7 मि.ली. मात्र को 15 ली. पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए । मूंगफली/अरबी या अन्य फसलों में पत्ति धब्बा या झुलसा रोग के प्रकोप के नियंत्रण हेतु रेडोमिल(मन्कोजेब+मेटालेक्जिल) दवा की 3 ग्राम मात्र प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए । तना मक्खी व सफेद लट का प्रकोप शुरू हो गया हैं। इसके लिए सफेद लट (ह्वाइट ग्रब ) यह सफेद रंग की मोटी इल्ली होती हैं तथा इसका व्यस्क भूरे रंग का होता हैं जो सायंकालीन जमीन से निकलकर पेडों की पत्तियों पर बैठा रहता हैं तथा बड़े पौधों को नुकसान पहुंचाता हैं। सफेद लट जमीन में रह कर पौधों की जड़ों को खाती रहती हैं। इसके कारण पौधे सूखे दिखाई देते हैं। अत्यधिक प्रकोप के कारण फसलों को लगभग 20 से 40 प्रतिशत का नुकसान हो तो सफेद लट के वयस्कों को पकडने के लिए लाइट ट्रेप एक प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। कार्बाफुरोन 3 प्रतिशत सीजी की 25 किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 40 से 50 किलो रेत में मिलाकर के या क्लोरोपाईरिफोस 20 प्रतिशत इसी की 4 लीटर मात्रा को 40 से लेम्डासाईहेलोथ्रिन 50 किलो रेत में मिलाकर के खेत में हाथ भुरकाव करें।




