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बैकयार्ड मुर्गी पालन के सामान्य रोग एवं उनके बचाव

नम्रता उपाघ्याय, अर्पिता श्रीवास्तव, नीरज श्रीवास्तव

दु्रगेश मिश्रा, राजीव रंजन, स्वतंत्र सिंह, नीतेश कुमार

अंकुश निरंजन, अमित कुमार झा
पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविघालय रीवा

ग्रामीण क्षेत्रों में बैकयार्ड मुर्गी पालन न केवल पोषण का स्रोत है, अपितु आय का एक महत्वपूर्ण साधन भी है। इन मुर्गियों मे रोग बहुत जल्दी फैलता है। बीमारियों का प्रकोप मुर्गियों में अक्सर भारी नुकसान का कारण भी बनता है। इन रोगों की समय पर पहचान और बचाव ही सफल मुर्गी पालन का आधार है।

बैकयार्ड मुर्गियों में होने वाले रोगों विषाणुजनित रोग

रानीखेत बीमारी
यह सबसे घातक बीमारी है। इसमे अधिकांष चूजे मर जाते है। सभी मुर्गियों का बीमार होना तथा प्रायः 90 प्रतिशत से ज्यादा बीमार मुर्गियों की मृत्यु होना इस रोग का प्रमुख लक्षणों में से होता है। मुर्गियाॅं सुस्त हो जाती है ,खाना-पीना बंद कर देती है। हरा/पीला या सफेद रंग के दस्त होते हैं, । सिर में सुजन व मुंह से लार गिरना। आधा मुंह खोलकर लंबी-लंबी साँस लेना साँस लेने में तकलीफ होती है, एवं साँस लेने में आवाज आना। मुर्गियों का ऊँघना-झुमना इसलिए इस रोग को झुमरी रोग भी कहते है। ।रोग के विषाणु अक्सर दूषित जल व दाने तथा बीमार व स्वस्थ्य मुर्गियों के एक दुसरे के संपर्क में आने से फैलता है। इस रोग से बचाव के लिए यह आवश्यक है कि मुर्गियों में रानीखेत का टीकाकरण नियमित रूप से किया जाये। दस्त होना। लकवा मारना-पंख लटक जाना/पांव का अकड़ जाना गर्दन टेड़ी होना।
फाउल पॉक्स बीमारी
इसमें मुर्गियों की कलगी, आँखों और पंख रहित हिस्सों पर मस्से जैसे दाने निकल आते हैं।देशी मुर्गियों में चेचक/माता रोग एक आम व् दूसरी प्रमुख बीमारी है। इससे ग्रस्त प्रायः सभी छोटे चूजों की मृत्यु हो जाती है। बड़ी मुर्गियों की मृत्यु तो कम होती है पर स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। यह एक विषाणु जनित रोग होने के कारण इसका इलाज संभव नही है। टीकाकरण ही एकमात्र बचाव का उपाय है। चूँकि बीमारी गाँव/पारा की मुर्गियों में छोटे/बड़े रूप में साल भर होती रहती है, इस कारण नियमित टीकाकरण से ही बीमारी से बचा जा सकता है। (साल में दो बार)।
यह बीमारी शरीर के अनेक स्थानो को प्रभावित करती है। त्वचा का चेचक सबसे अधिक देखने को मिलते है। छोटे-छोटे मटमैले छालों की तरह दाने कलगी तथा पंख रहते हिस्सों का उभर आते हैं। व् जल्दी से बढ़ जाते हैं और पपड़ी बन जाते है। फिर आपस में जुड़ जाते हैं व चेचक का रूप में ले लेते हैं।गले मे चेचक की यह किस्म सबसे ज्यादा नुकसानदेह है। इससे छोटे चूजों व बड़ी मुर्गियाँ की समान रूप से मृत्यु होती है। इसमें मुंह व गले के अंदर उभरे हुए छाले हो जाते है, जो बड़े होकर और गहरे हो जाते हैं। मुर्गियाँ अच्छी तरह खा नहीं पाती व उनकी हालत जल्दी बिगड़ जाती है व शीघ्र ही उनकी मृत्यु हो जाती है। जब यह चेचक आँखों को प्र्र्र्र्रभावित करती है तब आँखों में पानी आने लगता है जो बाद में गाढ़ा हो जाता है, आखें पीप से भर जाती है और फूल जाती है। पलक चिपक जाती हैं और मुर्गी देख नहीं पाती। फलस्वरूप भूख से मृत्यु हो जाती है। यह देखा गया है कि एक ही समय में अलग-अलग मुर्गियों में तीनों किस्में हो सकती है। चूकि यह एक विषाणु जनित रोग है अतः इसका इलाज सभव नही होता परन्तु छालों या फफोलों पर कोई एक अच्छा एंटीबायोटिक मलहम लगाकर रोग की तीव्रता को कम किया जा सकता है, रोग न होने से पहले नियमित टीकाकरण ही बचाव का एकमात्र सही एवं सस्ता उपाय है।
मैरेक्स
मुर्गियों में होने वाली एक बहुत ही संक्रामक और घातक बीमारी है।यह एक हर्पीस वायरस (भ्मतचमेअपतने) के कारण होता है।इसमें मुर्गियों के पैरों, पंखों या गर्दन में लकवा मार जाता है। एक विशिष्ट लक्षण है ष्एक पैर आगे और एक पैर पीछेष् की स्थिति बन जाती है शरीर के आंतरिक अंगों जैसे लीवर, तिल्ली, और फेफड़ों में ट्यूमर बन जाते हैं।
आंखों का रंग बदल जाता है,कुछ मामलों में आंखों की पुतली का आकार बदल जाता है और वे धूसर (ळतमल मलमे) हो जाती हैं, जिससे अंधापन हो सकता है। यह मुख्य रूप से संक्रमित पंखों की धूल और हवा के जरिए फैलता है।रू इसका एकमात्र प्रभावी इलाज टीकाकरण (टंबबपदंजपवद) है। चूजों को हैचरी से निकलते ही पहले दिन का टीका लगाया जाना चाहिए।फार्म में साफ-सफाई रखें और नए पक्षियों को पुराने झुंड से अलग रखें। एक बार संक्रमण होने के बाद इसका कोई प्रभावी इलाज नहीं है, इसलिए टीकाकरण ही सबसे महत्वपूर्ण है।
इन्फेक्शियस बरसल डिजीज
इन्फेक्शियस बरसल डिजीज, जिसे आमतौर पर श्गुम्बोरोश् (ळनउइवतव) के नाम से जाना जाता है, मुर्गियों के छोटे बच्चों (विशेषकर 3 से 6 सप्ताह की आयु) में होने वाली एक गंभीर वायरल बीमारी है। यह वायरस के कारण होता है। यह वायरस मुर्गियों की र्सा ऑफ फैब्रिसियसश् (ठनतें व िथ्ंइतपबपने) ग्रंथि पर हमला करता है, जो उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (प्उउनदपजल) बनाती है। इसके नष्ट होने से पक्षी अन्य बीमारियों से लड़ने में अक्षम हो जाता है। पक्षियों को गंभीर दस्त होते सफेद पानी जैसा जिससे उनके पीछे के पंख गंदे हो जाते हैं। पक्षी सुस्त होकर बैठ जाते हैं, पंख फैला देते हैं और खाना-पीना छोड़ देते हैं।पक्षियों में थराहट या कपकपी देखी जा सकती है। अचानक से बड़ी संख्या में चूजों की मौत होने लगती है। गुम्बोरो से बचने का सबसे प्रभावी तरीका सही समय पर वैक्सीन देना है। आमतौर पर यह 12-14 दिनों की उम्र में दी जाती है। शेड की पूरी तरह से सफाई और कीटाणुशोधन (क्पेपदमिबजपवद) अनिवार्य है क्योंकि यह वायरस वातावरण में लंबे समय तक जीवित रह सकता है। प्रभावित झुंड को विटामिन और इलेक्ट्रोलाइट्स देने से तनाव कम करने में मदद मिलती है।चूंकि यह एक वायरल बीमारी है, इसलिए एंटीबायोटिक्स इसे ठीक नहीं कर सकतीं। केवल टीकाकरण और साफ-सफाई ही इससे बचा सकते हैं।
इन्फेक्शियस ब्रोंकाइटिस
मुर्गियों में होने वाला एक अत्यधिक संक्रामक श्वसन रोग है, जो श्कोरोनावायरसश् परिवार के एक वायरस के कारण होता है। यह विशेष रूप से श्वसन तंत्र, गुर्दों (ज्ञपकदमले) और प्रजनन तंत्र को प्रभावित करता है। मुर्गियों में छींकना, खांसी, खर्राटे (ळंेचपदह) और नाक से पानी बहना देखा जाता है। लेयर मुर्गियों में अंडों की संख्या अचानक कम हो जाती है। अंडों का छिलका पतला, खुरदरा या आकार में टेढ़ा-मेढ़ा हो सकता है, और अंडे की सफेदी (।सइनउपद) पानी जैसी पतली हो जाती है।वायरस के कुछ स्ट्रेन गुर्दों को प्रभावित करते हैं, जिससे पक्षी बहुत अधिक पानी पीते हैं और गीला बीट (ॅमज कतवचचपदहे) करते हैं। छोटे चूजों में यह स्थायी रूप से प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुँचा सकता है। यह वायरस हवा के जरिए (।मतवेवस), संक्रमित दानों, पानी और उपकरणों के माध्यम से बहुत तेजी से फैलता है। इस बीमारी से बचने का सबसे अच्छा तरीका टीकाकरण है। चूजों को शुरुआती दिनों में श्लाइव वैक्सीनश् (जैसे भ्-120 या डं5 स्ट्रेन) दी जाती है। प्रभावित मुर्गियों के लिए शेड का तापमान 2-3 डिग्री बढ़ा देने से उन्हें सांस लेने में राहत मिलती है। चूंकि यह एक वायरल बीमारी है, इसलिए इसका कोई सीधा इलाज नहीं है। द्वितीयक जीवाणु संक्रमण (ैमबवदकंतल इंबजमतपंस पदमिबजपवद) को रोकने के लिए डॉक्टर की सलाह पर एंटीबायोटिक्स दी जा सकती हैं, लेकिन मुख्य बचाव वैक्सीन ही है।
एवियन इन्फ्लुएंजा
आमतौर पर श्बर्ड फ्लूश् (ठपतक थ्सन) कहा जाता है, एक अत्यंत संक्रामक और घातक वायरल बीमारी है। यह मुख्य रूप से श्इन्फ्लुएंजा टाइप-।श् वायरस के कारण होती है। कई बार बिना किसी लक्षण के पक्षी अचानक बड़ी संख्या में मरने लगते हैं।सिर, आंखों के आसपास और कलगी में भारी सूजन आ जाती है।कलगी और पैरों का रंग नीला या बैंगनी होने लगता है (ब्लंदवेपे)। सांस लेने में तकलीफ, खांसी और नाक से खून मिला स्राव निकलना। अंडों का उत्पादन गिर जाता है और छिलके बहुत नरम हो जाते हैं। यह जंगली पक्षियों (खासकर प्रवासी पक्षियों) के माध्यम से फैलता है। संक्रमित पक्षी की बीट, लार और नाक के स्राव से दाना, पानी और उपकरण दूषित हो जाते हैं। बर्ड फ्लू के कुछ स्ट्रेन (जैसे भ्5छ1 और भ्7छ9) पक्षियों से इंसानों में भी फैल सकते हैं, जो जानलेवा साबित हो सकते हैं। इसलिए मृत पक्षियों को छूते समय विशेष सावधानी जरूरी है।संक्रमण की पुष्टि होने पर प्रभावित क्षेत्र के सभी पक्षियों को मार दिया जाता है और उन्हें गहरा दफनाया जाता है ताकि प्रसार रुक सके। फार्म में बाहरी लोगों और जंगली पक्षियों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित रखें।असामान्य मृत्यु दिखने पर तुरंत नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सालय को सूचित करें। बर्ड फ्लू के दौरान चिकन या अंडे को हमेशा पूरी तरह पकाकर (70°ब् से ऊपर) ही खाएं, जिससे वायरस नष्ट हो जाता है।
सामान्य सावधानिया
समान आयु समूहरू अलग-अलग उम्र की मुर्गियों को एक साथ न रखें, क्योंकि वयस्क मुर्गियाँ छोटे चूजों में संक्रमण फैला सकती हैं।यदि कोई मुर्गी बीमार दिखे, तो उसे तुरंत झुंड से अलग कर दें और विशेषज्ञ से परामर्श लें।

बैकयार्ड मुर्गी पालन में ष्उपचार से बेहतर बचाव हैष् का सिद्धांत लागू होता है। संतुलित आहार, स्वच्छ पानी और समय पर टीकाकरण के माध्यम से किसान अपनी मुर्गियों को सुरक्षित रखकर अधिकतम लाभ कमा सकते हैं।

बैकयार्ड मुर्गी पालन के सामान्य रोग एवं उनके बचाव

नम्रता उपाघ्याय, अर्पिता श्रीवास्तव, नीरज श्रीवास्तव

दु्रगेश मिश्रा, राजीव रंजन, स्वतंत्र सिंह, नीतेश कुमार

अंकुश निरंजन, अमित कुमार झा
पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविघालय रीवा

ग्रामीण क्षेत्रों में बैकयार्ड मुर्गी पालन न केवल पोषण का स्रोत है, अपितु आय का एक महत्वपूर्ण साधन भी है। इन मुर्गियों मे रोग बहुत जल्दी फैलता है। बीमारियों का प्रकोप मुर्गियों में अक्सर भारी नुकसान का कारण भी बनता है। इन रोगों की समय पर पहचान और बचाव ही सफल मुर्गी पालन का आधार है।

बैकयार्ड मुर्गियों में होने वाले रोगों विषाणुजनित रोग

रानीखेत बीमारी
यह सबसे घातक बीमारी है। इसमे अधिकांष चूजे मर जाते है। सभी मुर्गियों का बीमार होना तथा प्रायः 90 प्रतिशत से ज्यादा बीमार मुर्गियों की मृत्यु होना इस रोग का प्रमुख लक्षणों में से होता है। मुर्गियाॅं सुस्त हो जाती है ,खाना-पीना बंद कर देती है। हरा/पीला या सफेद रंग के दस्त होते हैं, । सिर में सुजन व मुंह से लार गिरना। आधा मुंह खोलकर लंबी-लंबी साँस लेना साँस लेने में तकलीफ होती है, एवं साँस लेने में आवाज आना। मुर्गियों का ऊँघना-झुमना इसलिए इस रोग को झुमरी रोग भी कहते है। ।रोग के विषाणु अक्सर दूषित जल व दाने तथा बीमार व स्वस्थ्य मुर्गियों के एक दुसरे के संपर्क में आने से फैलता है। इस रोग से बचाव के लिए यह आवश्यक है कि मुर्गियों में रानीखेत का टीकाकरण नियमित रूप से किया जाये। दस्त होना। लकवा मारना-पंख लटक जाना/पांव का अकड़ जाना गर्दन टेड़ी होना।
फाउल पॉक्स बीमारी
इसमें मुर्गियों की कलगी, आँखों और पंख रहित हिस्सों पर मस्से जैसे दाने निकल आते हैं।देशी मुर्गियों में चेचक/माता रोग एक आम व् दूसरी प्रमुख बीमारी है। इससे ग्रस्त प्रायः सभी छोटे चूजों की मृत्यु हो जाती है। बड़ी मुर्गियों की मृत्यु तो कम होती है पर स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। यह एक विषाणु जनित रोग होने के कारण इसका इलाज संभव नही है। टीकाकरण ही एकमात्र बचाव का उपाय है। चूँकि बीमारी गाँव/पारा की मुर्गियों में छोटे/बड़े रूप में साल भर होती रहती है, इस कारण नियमित टीकाकरण से ही बीमारी से बचा जा सकता है। (साल में दो बार)।
यह बीमारी शरीर के अनेक स्थानो को प्रभावित करती है। त्वचा का चेचक सबसे अधिक देखने को मिलते है। छोटे-छोटे मटमैले छालों की तरह दाने कलगी तथा पंख रहते हिस्सों का उभर आते हैं। व् जल्दी से बढ़ जाते हैं और पपड़ी बन जाते है। फिर आपस में जुड़ जाते हैं व चेचक का रूप में ले लेते हैं।गले मे चेचक की यह किस्म सबसे ज्यादा नुकसानदेह है। इससे छोटे चूजों व बड़ी मुर्गियाँ की समान रूप से मृत्यु होती है। इसमें मुंह व गले के अंदर उभरे हुए छाले हो जाते है, जो बड़े होकर और गहरे हो जाते हैं। मुर्गियाँ अच्छी तरह खा नहीं पाती व उनकी हालत जल्दी बिगड़ जाती है व शीघ्र ही उनकी मृत्यु हो जाती है। जब यह चेचक आँखों को प्र्र्र्र्रभावित करती है तब आँखों में पानी आने लगता है जो बाद में गाढ़ा हो जाता है, आखें पीप से भर जाती है और फूल जाती है। पलक चिपक जाती हैं और मुर्गी देख नहीं पाती। फलस्वरूप भूख से मृत्यु हो जाती है। यह देखा गया है कि एक ही समय में अलग-अलग मुर्गियों में तीनों किस्में हो सकती है। चूकि यह एक विषाणु जनित रोग है अतः इसका इलाज सभव नही होता परन्तु छालों या फफोलों पर कोई एक अच्छा एंटीबायोटिक मलहम लगाकर रोग की तीव्रता को कम किया जा सकता है, रोग न होने से पहले नियमित टीकाकरण ही बचाव का एकमात्र सही एवं सस्ता उपाय है।
मैरेक्स
मुर्गियों में होने वाली एक बहुत ही संक्रामक और घातक बीमारी है।यह एक हर्पीस वायरस (भ्मतचमेअपतने) के कारण होता है।इसमें मुर्गियों के पैरों, पंखों या गर्दन में लकवा मार जाता है। एक विशिष्ट लक्षण है ष्एक पैर आगे और एक पैर पीछेष् की स्थिति बन जाती है शरीर के आंतरिक अंगों जैसे लीवर, तिल्ली, और फेफड़ों में ट्यूमर बन जाते हैं।
आंखों का रंग बदल जाता है,कुछ मामलों में आंखों की पुतली का आकार बदल जाता है और वे धूसर (ळतमल मलमे) हो जाती हैं, जिससे अंधापन हो सकता है। यह मुख्य रूप से संक्रमित पंखों की धूल और हवा के जरिए फैलता है।रू इसका एकमात्र प्रभावी इलाज टीकाकरण (टंबबपदंजपवद) है। चूजों को हैचरी से निकलते ही पहले दिन का टीका लगाया जाना चाहिए।फार्म में साफ-सफाई रखें और नए पक्षियों को पुराने झुंड से अलग रखें। एक बार संक्रमण होने के बाद इसका कोई प्रभावी इलाज नहीं है, इसलिए टीकाकरण ही सबसे महत्वपूर्ण है।
इन्फेक्शियस बरसल डिजीज
इन्फेक्शियस बरसल डिजीज, जिसे आमतौर पर श्गुम्बोरोश् (ळनउइवतव) के नाम से जाना जाता है, मुर्गियों के छोटे बच्चों (विशेषकर 3 से 6 सप्ताह की आयु) में होने वाली एक गंभीर वायरल बीमारी है। यह वायरस के कारण होता है। यह वायरस मुर्गियों की र्सा ऑफ फैब्रिसियसश् (ठनतें व िथ्ंइतपबपने) ग्रंथि पर हमला करता है, जो उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (प्उउनदपजल) बनाती है। इसके नष्ट होने से पक्षी अन्य बीमारियों से लड़ने में अक्षम हो जाता है। पक्षियों को गंभीर दस्त होते सफेद पानी जैसा जिससे उनके पीछे के पंख गंदे हो जाते हैं। पक्षी सुस्त होकर बैठ जाते हैं, पंख फैला देते हैं और खाना-पीना छोड़ देते हैं।पक्षियों में थराहट या कपकपी देखी जा सकती है। अचानक से बड़ी संख्या में चूजों की मौत होने लगती है। गुम्बोरो से बचने का सबसे प्रभावी तरीका सही समय पर वैक्सीन देना है। आमतौर पर यह 12-14 दिनों की उम्र में दी जाती है। शेड की पूरी तरह से सफाई और कीटाणुशोधन (क्पेपदमिबजपवद) अनिवार्य है क्योंकि यह वायरस वातावरण में लंबे समय तक जीवित रह सकता है। प्रभावित झुंड को विटामिन और इलेक्ट्रोलाइट्स देने से तनाव कम करने में मदद मिलती है।चूंकि यह एक वायरल बीमारी है, इसलिए एंटीबायोटिक्स इसे ठीक नहीं कर सकतीं। केवल टीकाकरण और साफ-सफाई ही इससे बचा सकते हैं।
इन्फेक्शियस ब्रोंकाइटिस
मुर्गियों में होने वाला एक अत्यधिक संक्रामक श्वसन रोग है, जो श्कोरोनावायरसश् परिवार के एक वायरस के कारण होता है। यह विशेष रूप से श्वसन तंत्र, गुर्दों (ज्ञपकदमले) और प्रजनन तंत्र को प्रभावित करता है। मुर्गियों में छींकना, खांसी, खर्राटे (ळंेचपदह) और नाक से पानी बहना देखा जाता है। लेयर मुर्गियों में अंडों की संख्या अचानक कम हो जाती है। अंडों का छिलका पतला, खुरदरा या आकार में टेढ़ा-मेढ़ा हो सकता है, और अंडे की सफेदी (।सइनउपद) पानी जैसी पतली हो जाती है।वायरस के कुछ स्ट्रेन गुर्दों को प्रभावित करते हैं, जिससे पक्षी बहुत अधिक पानी पीते हैं और गीला बीट (ॅमज कतवचचपदहे) करते हैं। छोटे चूजों में यह स्थायी रूप से प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुँचा सकता है। यह वायरस हवा के जरिए (।मतवेवस), संक्रमित दानों, पानी और उपकरणों के माध्यम से बहुत तेजी से फैलता है। इस बीमारी से बचने का सबसे अच्छा तरीका टीकाकरण है। चूजों को शुरुआती दिनों में श्लाइव वैक्सीनश् (जैसे भ्-120 या डं5 स्ट्रेन) दी जाती है। प्रभावित मुर्गियों के लिए शेड का तापमान 2-3 डिग्री बढ़ा देने से उन्हें सांस लेने में राहत मिलती है। चूंकि यह एक वायरल बीमारी है, इसलिए इसका कोई सीधा इलाज नहीं है। द्वितीयक जीवाणु संक्रमण (ैमबवदकंतल इंबजमतपंस पदमिबजपवद) को रोकने के लिए डॉक्टर की सलाह पर एंटीबायोटिक्स दी जा सकती हैं, लेकिन मुख्य बचाव वैक्सीन ही है।
एवियन इन्फ्लुएंजा
आमतौर पर श्बर्ड फ्लूश् (ठपतक थ्सन) कहा जाता है, एक अत्यंत संक्रामक और घातक वायरल बीमारी है। यह मुख्य रूप से श्इन्फ्लुएंजा टाइप-।श् वायरस के कारण होती है। कई बार बिना किसी लक्षण के पक्षी अचानक बड़ी संख्या में मरने लगते हैं।सिर, आंखों के आसपास और कलगी में भारी सूजन आ जाती है।कलगी और पैरों का रंग नीला या बैंगनी होने लगता है (ब्लंदवेपे)। सांस लेने में तकलीफ, खांसी और नाक से खून मिला स्राव निकलना। अंडों का उत्पादन गिर जाता है और छिलके बहुत नरम हो जाते हैं। यह जंगली पक्षियों (खासकर प्रवासी पक्षियों) के माध्यम से फैलता है। संक्रमित पक्षी की बीट, लार और नाक के स्राव से दाना, पानी और उपकरण दूषित हो जाते हैं। बर्ड फ्लू के कुछ स्ट्रेन (जैसे भ्5छ1 और भ्7छ9) पक्षियों से इंसानों में भी फैल सकते हैं, जो जानलेवा साबित हो सकते हैं। इसलिए मृत पक्षियों को छूते समय विशेष सावधानी जरूरी है।संक्रमण की पुष्टि होने पर प्रभावित क्षेत्र के सभी पक्षियों को मार दिया जाता है और उन्हें गहरा दफनाया जाता है ताकि प्रसार रुक सके। फार्म में बाहरी लोगों और जंगली पक्षियों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित रखें।असामान्य मृत्यु दिखने पर तुरंत नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सालय को सूचित करें। बर्ड फ्लू के दौरान चिकन या अंडे को हमेशा पूरी तरह पकाकर (70°ब् से ऊपर) ही खाएं, जिससे वायरस नष्ट हो जाता है।
सामान्य सावधानिया
समान आयु समूहरू अलग-अलग उम्र की मुर्गियों को एक साथ न रखें, क्योंकि वयस्क मुर्गियाँ छोटे चूजों में संक्रमण फैला सकती हैं।यदि कोई मुर्गी बीमार दिखे, तो उसे तुरंत झुंड से अलग कर दें और विशेषज्ञ से परामर्श लें।

बैकयार्ड मुर्गी पालन में ष्उपचार से बेहतर बचाव हैष् का सिद्धांत लागू होता है। संतुलित आहार, स्वच्छ पानी और समय पर टीकाकरण के माध्यम से किसान अपनी मुर्गियों को सुरक्षित रखकर अधिकतम लाभ कमा सकते हैं।

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