टीकमगढ़, कृषि विज्ञान टीकमगढ़ के वैज्ञानिक डॉ. बी.एस. किरार, डॉ. आर.के. प्रजापति एवं जयपाल छिगारहा द्वारा आने वाले खरीफ मौसम में उर्द, तिल, मूंगफली और सोयाबीन के लिए किसानों को संतुलित उर्वरक एवं खाद प्रबंधन सही मात्र, विधि और समय बताया जा रहा है जिससे मिट्टी की उर्वरक शक्ति बनी रहती है गलत तरीके से उर्वरकों के उपयोग से जल, मृदा और पर्यावरण प्रदूषण बढता है एवं खेती में बढ़ती लागत को कम किया जा सकता है मृदा परीक्षणों से खेत में उपलब्ध पोषक तत्वों के आधार पर जिले में मुख्य रूप से खरीफ में बोई जाने वाली फसलों में उड़द, मूंगफली, सोयाबीन और तिल है जिनके लिए मुख्य पोषक तत्वों की अनुशंसित मात्रा किलोग्राम प्रति हेक्टर जैसे कि उड़द के लिए नत्रजन (20 किग्रा/हे.), फास्फोरस (50 किग्रा/हे.), पोटाश (20 किग्रा/हे.), मूंगफली और सोयाबीन के लिए नत्रजन (20 किग्रा/हे.), फास्फोरस (60 किग्रा/हे.), पोटाश (20 किग्रा/हे.) तथा तिल के लिए नत्रजन (40 किग्रा/हे.), फास्फोरस (30 किग्रा/हे.), पोटाश (20 किग्रा/हे. की जरूरत होगी। जिसकी पूर्ति के लिए गोबर की खाद या उर्वरक का उपयोग किया जा सकता है । यदि किसान भाई ने हरी खाद या गोबर की खाद का उपयोग किया है इससे खेत में नत्रजन की मात्रा बढ़ जाती है जिससे कि उर्वरकों की मात्रा में 25 से 50% तक की कमी किया जा सकता है इससे किसानो को रासायनिक उर्वरक पर होने वाले खर्चों में (गोबर की खाद + हरी खाद) पर 75% की कमी आती है गोबर की खाद में नत्रजन (0.5%), फस्फोरुस (0.2% ) और पोटाश (0. 5%) होने के कारण मुख्य पोषक तत्वों में 25% कमी की पूर्ति करना जरूरी होता है, गोबर की खाद 5 से 10 टन प्रति हेक्टर डालने पर यह लाभ मिलता है जिन किसानों के खेत में मिटटी में कार्बन (0.5%) से कम है उसको निम्न स्तर का कार्बन होने के कारण मिट्टी में हवा संचार, जलधारण क्षमता और अन्य लाभकारी सूक्ष्म जीव जैविक क्रियाओं को प्रभावित करता है, इसलिए खेत में मध्यम स्तर कार्बन (0.5 से 0.75%) और (0.75%) से अधिक उच्च स्तर होता है, इसलिए गोबर की खाद, हरी खाद और जैविक उर्वरक का उपयोग करना बहुत जरूरी होता है। गोबार की खाद, हरी खाद और जैविक उर्वरक खेत की भौतिक दशाओं में भी सुधर लाती है मुख्य पोषक तत्वों में नाइट्रोजन का पौधों की वृद्धि और विकास के लिए सबसे आवश्यक प्राथमिक पोषक तत्व है। यह क्लोरोफिल, प्रोटीन का मुख्य घटक है, जो प्रकाश संश्लेषण और स्वस्थ पत्तियों के निर्माण के लिए अनिवार्य है। ऐसी ही मिटटी में में यादि नत्रजन (280 किग्रा/हे) से कम है तो ये नत्रजन का मिटटी में उपलब्ध होने का निम्न स्तर वाली मिट्टियो कहलाएगी वहीं (280- 560 किग्रा/हे) मध्य स्तर और (560 किग्रा/हे) स्तर से अधिक उच्च स्तर नत्रजन वाली मिटटी कहलाएगी। फास्फोरस मुख्य दूसरा पोषक तत्व है जो पौधो में प्रकश संश्लेषण जड़ों का विकास, उर्जा का हस्तांतरण और कोशिका विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है यानि बिना फास्फोरस के पौधो की वृद्धि, फूलने फलने और बीज निर्माण की क्रिया संभव नहीं है । फास्फोरस की मात्रा मृदा में 10 कि.ग्रा./हे. निम्न स्तर 10- 25 कि.ग्रा. माध्यम स्तर और 25 कि.ग्रा. से अधिक प्रति हेक्टेयर उच्च स्तर कहलाता है पोटाश पौधो में मजबूत तना, रोगों से लड़ने की क्षमता और प्रतिकूल मौसम (सूखा) से बचाव प्रदान करने का तीसरा महत्वपूर्ण पोषक तत्व होता है । पोटाश की मात्रा 120 कि.ग्रा. निम्न स्तर 120-180 कि.ग्रा. मध्यम में स्तर और 280 कि.ग्रा./हे. से अधिक उच्च स्तर कहलाता है। अगर निम्न स्तर पर पोषक तत्वों की मृदा परीक्षण पर उपलब्धता आती है तो संतुलित अनुशंसित उर्वरकों की मात्रा फसल वार लगती है उसमें 25% की बढ़ोतरी करना चाहिए और यदि माध्यम है तो मात्रा अनुशंसित उर्वरक मात्र ही उपयोग करने की जरूरत होती है अगर उच्च स्तर हो तो उर्वरक में 25% की कमी करना फसल अनुसार जरूरी होता है अगर डी.ए.पी. की जगह यूरिया (46% नत्रजन) से या सिंगल सुपर फास्फेट(16% फास्फोरस, 11% सल्फर और 19-21% केल्सियम) और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश (60% पोटाश)करना हो तो उर्द में 43, 312 और 33कि.ग्रा. क्रमशः यूरिया, एस.एस.पी. और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की जरुरत प्रति हेक्टेयर होगी । इसी तरह सोयबीन एवं मूंगफली के लिए 43, 375 और 33कि.ग्रा. क्रमशः यूरिया, एस.एस.पी. और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की जरुरत होगी। और तिल के लिए 86, 187 और 33 कि.ग्रा. क्रमशः यूरिया, एस.एस.पी. और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की जरुरत होगी। फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्र और यूरिया की आधी मात्र बुबाई के समय खेत में मिला दे तथा बाकी यूरिया बाद में दो बार में खेत में फसल के विभिन्न आवश्यक समय पर देना चाहिए।
जानिए खरीफ फसलों में उर्वरक एवं खाद प्रबंधन कैसे करें
टीकमगढ़, कृषि विज्ञान टीकमगढ़ के वैज्ञानिक डॉ. बी.एस. किरार, डॉ. आर.के. प्रजापति एवं जयपाल छिगारहा द्वारा आने वाले खरीफ मौसम में उर्द, तिल, मूंगफली और सोयाबीन के लिए किसानों को संतुलित उर्वरक एवं खाद प्रबंधन सही मात्र, विधि और समय बताया जा रहा है जिससे मिट्टी की उर्वरक शक्ति बनी रहती है गलत तरीके से उर्वरकों के उपयोग से जल, मृदा और पर्यावरण प्रदूषण बढता है एवं खेती में बढ़ती लागत को कम किया जा सकता है मृदा परीक्षणों से खेत में उपलब्ध पोषक तत्वों के आधार पर जिले में मुख्य रूप से खरीफ में बोई जाने वाली फसलों में उड़द, मूंगफली, सोयाबीन और तिल है जिनके लिए मुख्य पोषक तत्वों की अनुशंसित मात्रा किलोग्राम प्रति हेक्टर जैसे कि उड़द के लिए नत्रजन (20 किग्रा/हे.), फास्फोरस (50 किग्रा/हे.), पोटाश (20 किग्रा/हे.), मूंगफली और सोयाबीन के लिए नत्रजन (20 किग्रा/हे.), फास्फोरस (60 किग्रा/हे.), पोटाश (20 किग्रा/हे.) तथा तिल के लिए नत्रजन (40 किग्रा/हे.), फास्फोरस (30 किग्रा/हे.), पोटाश (20 किग्रा/हे. की जरूरत होगी। जिसकी पूर्ति के लिए गोबर की खाद या उर्वरक का उपयोग किया जा सकता है । यदि किसान भाई ने हरी खाद या गोबर की खाद का उपयोग किया है इससे खेत में नत्रजन की मात्रा बढ़ जाती है जिससे कि उर्वरकों की मात्रा में 25 से 50% तक की कमी किया जा सकता है इससे किसानो को रासायनिक उर्वरक पर होने वाले खर्चों में (गोबर की खाद + हरी खाद) पर 75% की कमी आती है गोबर की खाद में नत्रजन (0.5%), फस्फोरुस (0.2% ) और पोटाश (0. 5%) होने के कारण मुख्य पोषक तत्वों में 25% कमी की पूर्ति करना जरूरी होता है, गोबर की खाद 5 से 10 टन प्रति हेक्टर डालने पर यह लाभ मिलता है जिन किसानों के खेत में मिटटी में कार्बन (0.5%) से कम है उसको निम्न स्तर का कार्बन होने के कारण मिट्टी में हवा संचार, जलधारण क्षमता और अन्य लाभकारी सूक्ष्म जीव जैविक क्रियाओं को प्रभावित करता है, इसलिए खेत में मध्यम स्तर कार्बन (0.5 से 0.75%) और (0.75%) से अधिक उच्च स्तर होता है, इसलिए गोबर की खाद, हरी खाद और जैविक उर्वरक का उपयोग करना बहुत जरूरी होता है। गोबार की खाद, हरी खाद और जैविक उर्वरक खेत की भौतिक दशाओं में भी सुधर लाती है मुख्य पोषक तत्वों में नाइट्रोजन का पौधों की वृद्धि और विकास के लिए सबसे आवश्यक प्राथमिक पोषक तत्व है। यह क्लोरोफिल, प्रोटीन का मुख्य घटक है, जो प्रकाश संश्लेषण और स्वस्थ पत्तियों के निर्माण के लिए अनिवार्य है। ऐसी ही मिटटी में में यादि नत्रजन (280 किग्रा/हे) से कम है तो ये नत्रजन का मिटटी में उपलब्ध होने का निम्न स्तर वाली मिट्टियो कहलाएगी वहीं (280- 560 किग्रा/हे) मध्य स्तर और (560 किग्रा/हे) स्तर से अधिक उच्च स्तर नत्रजन वाली मिटटी कहलाएगी। फास्फोरस मुख्य दूसरा पोषक तत्व है जो पौधो में प्रकश संश्लेषण जड़ों का विकास, उर्जा का हस्तांतरण और कोशिका विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है यानि बिना फास्फोरस के पौधो की वृद्धि, फूलने फलने और बीज निर्माण की क्रिया संभव नहीं है । फास्फोरस की मात्रा मृदा में 10 कि.ग्रा./हे. निम्न स्तर 10- 25 कि.ग्रा. माध्यम स्तर और 25 कि.ग्रा. से अधिक प्रति हेक्टेयर उच्च स्तर कहलाता है पोटाश पौधो में मजबूत तना, रोगों से लड़ने की क्षमता और प्रतिकूल मौसम (सूखा) से बचाव प्रदान करने का तीसरा महत्वपूर्ण पोषक तत्व होता है । पोटाश की मात्रा 120 कि.ग्रा. निम्न स्तर 120-180 कि.ग्रा. मध्यम में स्तर और 280 कि.ग्रा./हे. से अधिक उच्च स्तर कहलाता है। अगर निम्न स्तर पर पोषक तत्वों की मृदा परीक्षण पर उपलब्धता आती है तो संतुलित अनुशंसित उर्वरकों की मात्रा फसल वार लगती है उसमें 25% की बढ़ोतरी करना चाहिए और यदि माध्यम है तो मात्रा अनुशंसित उर्वरक मात्र ही उपयोग करने की जरूरत होती है अगर उच्च स्तर हो तो उर्वरक में 25% की कमी करना फसल अनुसार जरूरी होता है अगर डी.ए.पी. की जगह यूरिया (46% नत्रजन) से या सिंगल सुपर फास्फेट(16% फास्फोरस, 11% सल्फर और 19-21% केल्सियम) और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश (60% पोटाश)करना हो तो उर्द में 43, 312 और 33कि.ग्रा. क्रमशः यूरिया, एस.एस.पी. और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की जरुरत प्रति हेक्टेयर होगी । इसी तरह सोयबीन एवं मूंगफली के लिए 43, 375 और 33कि.ग्रा. क्रमशः यूरिया, एस.एस.पी. और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की जरुरत होगी। और तिल के लिए 86, 187 और 33 कि.ग्रा. क्रमशः यूरिया, एस.एस.पी. और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की जरुरत होगी। फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्र और यूरिया की आधी मात्र बुबाई के समय खेत में मिला दे तथा बाकी यूरिया बाद में दो बार में खेत में फसल के विभिन्न आवश्यक समय पर देना चाहिए।
जानिए खरीफ फसलों में उर्वरक एवं खाद प्रबंधन कैसे करें



