कविता रावत, दीपिका डायना जेस्से, रंजीत आइच, ज्योत्सना शक्करपूड़े, मनोज कुमार अहिरवार, श्वेत राजोरिया, मधू शिवहरे, नवल सिंह रावत एवं गायत्री देवांगन
पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, महू
भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहां बकरी पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। देश के लाखों छोटे और सीमांत किसान, भूमिहीन मजदूर तथा महिलाएं अपनी अतिरिक्त आय और आर्थिक सुरक्षा के लिए बकरी पालन पर निर्भर हैं। बकरी पालन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे कम पूंजी, कम भूमि और सीमित संसाधनों के साथ भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है। यही कारण है कि बकरी को अक्सर “गरीब व्यक्ति की गाय” कहा जाता है। आज बाजार में बकरी के दूध और मांस की मांग लगातार बढ़ रही है। बकरी का दूध सुपाच्य माना जाता है तथा कई स्थानों पर इसे औषधीय गुणों के कारण भी पसंद किया जाता है। वहीं बकरी का मांस प्रोटीन का उत्कृष्ट स्रोत है और इसकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। इसलिए बकरी पालन आज केवल परंपरागत गतिविधि नहीं, बल्कि एक लाभकारी व्यवसाय बन चुका है। लेकिन, जहां एक ओर बरसात का मौसम खेतों और चरागाहों में हरियाली लेकर आता है, वहीं दूसरी ओर यह बकरी पालन के लिए कई चुनौतियां भी खड़ी करता है। यदि इस मौसम में थोड़ी सी लापरवाही हो जाए तो बकरियां अनेक बीमारियों का शिकार हो सकती हैं, जिससे पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बरसात में बकरियां अधिक बीमार क्यों पड़ती हैं?
मानसून के दौरान वातावरण में नमी काफी बढ़ जाती है। लगातार बारिश के कारण जमीन गीली रहती है, कई जगहों पर पानी जमा हो जाता है और पशुशालाओं में भी नमी बनी रहती है। यह स्थिति जीवाणुओं, विषाणुओं, फफूंदों और परजीवियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। बकरियां स्वभाव से सूखे और स्वच्छ वातावरण में रहना पसंद करती हैं। जब वे लंबे समय तक गीली और ठंडी परिस्थितियों में रहती हैं तो उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होने लगती है। ऐसे में रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव आसानी से उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इसके अतिरिक्त, वर्षा ऋतु में चरागाहों में पेट के कीड़ों के अंडे और लार्वा तेजी से विकसित होते हैं। संक्रमित घास चरने पर ये परजीवी बकरियों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनते हैं।
बकरी शेड या गोठ का महत्व
बरसात के मौसम में पशुशाला का प्रबंधन ही आधी बीमारियों को रोक सकता है। शेड हमेशा ऊंची जगह पर होना चाहिए ताकि वर्षा का पानी उसमें प्रवेश न कर सके। जहां पानी भरता हो, वहां बकरी शेड नहीं बनाना चाहिए। यदि फर्श कच्चा है तो उस पर सूखा भूसा, लकड़ी का बुरादा, सूखी पत्तियां या अन्य बिछावन सामग्री डालनी चाहिए। गीली बिछावन को तुरंत बदल देना चाहिए क्योंकि यही नमी रोगों को जन्म देती है। एक बात और ध्यान रखें—शेड में हवा का आवागमन होना चाहिए, लेकिन ठंडी हवा सीधे पशुओं पर नहीं लगनी चाहिए। पर्याप्त वेंटिलेशन से नमी कम होती है और श्वसन रोगों का खतरा घटता है।
निमोनिया: बरसात की बड़ी समस्या
बरसात में बकरियों में सबसे सामान्य और खतरनाक बीमारियों में से एक है—निमोनिया। जब बकरियां लंबे समय तक बारिश में भीगती हैं या गीले फर्श पर रहती हैं, तो उनके फेफड़ों में संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। शुरुआत में पशु को हल्की खांसी आती है, लेकिन समय पर उपचार न मिलने पर यह गंभीर रूप ले सकता है। निमोनिया से प्रभावित बकरी में बुखार, तेज सांस चलना, नाक से स्राव, सुस्ती और भूख कम लगने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। विशेष रूप से नवजात बच्चों और गर्भित बकरियों पर अधिक ध्यान देना चाहिए क्योंकि इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है।
दस्त और पाचन संबंधी समस्याएं
बरसात के मौसम में दस्त की समस्या भी बहुत आम है। कई बार पशुपालक हरे चारे की उपलब्धता देखकर अत्यधिक मात्रा में हरा चारा खिलाने लगते हैं। यदि चारा गीला, सड़ा हुआ या फफूंदयुक्त हो तो दस्त होने की संभावना और बढ़ जाती है। दस्त होने पर शरीर से पानी और आवश्यक खनिज लवण निकल जाते हैं। परिणामस्वरूप पशु कमजोर हो जाता है, वजन कम होने लगता है और दूध उत्पादन प्रभावित होता है। इसलिए हमेशा स्वच्छ पानी उपलब्ध कराएं और खराब गुणवत्ता वाला चारा कभी न खिलाएं।
पेट के कीड़ों से बचाव
बरसात में पेट के कीड़ों का प्रकोप बकरी पालन की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। यदि आपकी बकरी का वजन कम हो रहा है, बाल रूखे हो गए हैं, आंखों में पीलापन या सफेदी दिखाई दे रही है तथा पशु कमजोर लग रहा है, तो यह पेट के कीड़ों का संकेत हो सकता है।
नियमित कृमिनाशन कार्यक्रम अपनाना अत्यंत आवश्यक है। वर्षा प्रारंभ होने से पहले तथा पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार मानसून के दौरान कृमिनाशक दवाएं अवश्य दें।
संतुलित पोषण और खनिज तत्वों का महत्व
सिर्फ रोगों से बचाव ही पर्याप्त नहीं है। बरसात के मौसम में संतुलित पोषण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हरे चारे के साथ सूखा चारा अवश्य दें। इससे पाचन क्रिया संतुलित रहती है। खनिज मिश्रण और नमक की उपलब्धता सुनिश्चित करें। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और उत्पादन बेहतर होता है।
टीकाकरण—रोगों से सुरक्षा कवच
एक कहावत है—”इलाज से बेहतर बचाव”। बकरियों में पीपीआर, एंटरोटॉक्सिमिया, खुरपका-मुंहपका तथा अन्य संक्रामक रोगों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण कराना अत्यंत आवश्यक है। मानसून शुरू होने से पहले टीकाकरण पूरा कर लेना सबसे अच्छा माना जाता है।
बीमारी की शीघ्र पहचान
हर दिन अपने पशुओं को ध्यान से देखें। यदि कोई बकरी सुस्त दिखाई दे, चारा कम खाए, बार-बार लेटी रहे, खांसे, दस्त करे या सामान्य व्यवहार से अलग दिखे, तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें। रोग की प्रारंभिक अवस्था में उपचार अधिक प्रभावी और कम खर्चीला होता है।
निष्कर्ष
बरसात का मौसम चुनौतीपूर्ण अवश्य है, लेकिन सही प्रबंधन अपनाकर इसे अवसर में बदला जा सकता है। साफ और सूखा शेड, संतुलित आहार, स्वच्छ पानी, नियमित कृमिनाशन, समय पर टीकाकरण तथा सतर्क निगरानी—ये छह बातें आपकी बकरियों को स्वस्थ रखने की कुंजी हैं। स्वस्थ बकरी ही अधिक दूध देती है, तेजी से बढ़ती है, बेहतर प्रजनन करती है और अंततः अधिक लाभ प्रदान करती है।




