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सफल पशुपालन में चारे का महत्व

डॉ. सोनू कुमार यादव, डॉ. राहुल चैरसिया
डॉ. अंजनी कुमार मिश्रा, डॉ. प्रमोद शर्मा
डॉ. भावना अहरवाल

  • टीचिंग एसोसिएट, पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, रीवा, मध्य प्रदेश
  • सहायक आचार्य, पशु चिकित्सा औषधि विभाग, आर.आर. पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय,देवली, टोंक, राजस्थान
  • प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग,पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय,रीवा, मध्य प्रदेश
  • सहायक प्राध्यापक शिक्षण पशुधन फार्म परिसर विभाग पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय जबलपुर मध्य प्रदेश
  • सहायक प्राध्यापक पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग,पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय, नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर, मध्य प्रदेश

पशुपालन भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अभिन्न हिस्सा है। पशुधन से हमें दूध मांस ऊन और चमड़े जैसे अनेक उपयोगी उत्पाद प्राप्त होते हैं, साथ ही इनसे खेती-बाड़ी के विभिन्न कार्यों में भी बहुमूल्य सहायता मिलती है। पशुओं के स्वास्थ्य तथा उनकी उत्पादन क्षमता को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए संतुलित एवं पोषक तत्वों से भरपूर आहार अत्यंत आवश्यक माना जाता है। पशुओं के शरीर को आवश्यक ऊर्जा, प्रोटीन खनिज और विटामिन प्रदान करने में चारा मूलभूत भूमिका निभाता है और यह केवल उनके पोषण की पूर्ति तक सीमित नहीं है बल्कि उनके समग्र स्वास्थ्य दूध के उत्पादन और शारीरिक एवं मानसिक विकास को भी गहराई से प्रभावित करता है। यदि पशुओं को समुचित और पर्याप्त पोषण उपलब्ध न हो तो उनके शरीर की रोगों से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता धीरे-धीरे घट जाती है जिसके परिणामस्वरूप वे जल्दी बीमार पड़ सकते हैं और उनकी दैनिक कार्यक्षमता तथा उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ता है। अतः पशुपालन में सफलता प्राप्त करने के लिए उपयुक्त चारे का सावधानीपूर्वक चयन करना और उसके भंडारण वितरण तथा प्रबंधन की उचित व्यवस्था करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
चारे का महत्व
पशुओं के लिए चारे की अहमियत को कई दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है। सबसे पहले पशुओं के स्वस्थ रहने के लिए उन्हें आवश्यक पोषण का मिलना अत्यंत जरूरी है। यदि पशुओं को उचित आहार उपलब्ध न हो तो वे धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं और उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है जिससे वे विभिन्न प्रकार की बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं। इसके अलावा चारे में प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट वसा खनिज लवण और विटामिन जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं जो पशुओं की शारीरिक वृद्धि ऊर्जा प्रजनन क्षमता और समग्र सेहत के लिए अनिवार्य हैं। जो पशुओं की पोषण संबंधी जरूरतों की पूर्ति करते हैं। संतुलित आहार ग्रहण करने से पशु निरोगी बने रहते हैं और उनकी रोगों से लड़ने की शक्ति में वृद्धि होती है। डेयरी व्यवसाय से जुड़े कृषक दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के उद्देश्य से अपने पशुओं के लिए उत्तम कोटि के चारे की व्यवस्था करना अनिवार्य समझते हैं। जब गाय और भैंस को पोषक तत्वों से भरपूर भोजन उपलब्ध कराया जाता है तो वे अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में दूध देती हैं और उस दूध में वसा का स्तर भी संतोषजनक बना रहता है। इस प्रकार श्रेष्ठ गुणवत्ता वाला चारा दुग्ध उत्पादन में वृद्धि लाने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाता है।
पशुओं की प्रजनन क्षमता में सुधार उत्तम गुणवत्ता वाले चारे के सेवन से पशुओं की प्रजनन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। पोषक तत्वों की कमी अर्थात कुपोषण की स्थिति में पशुओं को प्रजनन संबंधी अनेक कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके विपरीत पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित चारा देने से पशु समय पर गर्भधारण करते हैं और स्वस्थ सशक्त संतति को जन्म देते हैं।
कार्यक्षमता और शक्ति में वृद्धि जो कृषक बैलों और घोड़ों से खेती-बाड़ी के कार्यों अथवा माल-वाहन और आवागमन के लिए काम लेते हैं उनके लिए चारे का महत्व और भी अधिक हो जाता है। उचित और पौष्टिक आहार से इन पशुओं की शारीरिक कार्यक्षमता और ऊर्जा बढ़ती है जिससे वे भारी श्रम को सरलता से सहन कर पाते हैं और लंबे समय तक स्वस्थ एवं सक्रिय बने रहते हैं।
आर्थिक लाभ संतुलित चारा देने से पशुओं की उत्पादकता में निरंतर बढ़ोतरी होती है जिसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव पशुपालक के आर्थिक लाभ पर पड़ता है। दूध मांस ऊन अथवा श्रम जैसे विभिन्न उत्पादों में वृद्धि होने से किसान की आय बढ़ती है और पशुपालन एक लाभकारी व्यवसाय के रूप में और अधिक सुदृढ़ होता है। जिससे किसानों को अधिक लाभ होता है। पौष्टिक आहार मिलने से पशु कम रोगग्रस्त होते हैं और इसी कारण उनके इलाज पर होने वाला खर्च भी घट जाता है। साथ ही इससे दूध मांस और अन्य पशु-उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार आता है जिसके फलस्वरूप बाजार में उन्हें बेहतर दाम प्राप्त होते हैं।
चारे के प्रकार
चारा मुख्यतः तीन प्रकार का होता है। इनमें पहला है हरा चारा जिसे पशुओं के लिए सबसे अधिक पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है। इसमें जल की मात्रा अधिक पाई जाती है और यह पशुओं के शरीर को भरपूर ऊर्जा प्रदान करता है। हरे चारे की कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं नेपियर घास जो दुधारू पशुओं के लिए अत्यंत उत्तम चारा माना जाता है। बरसीम जिसे सर्दियों के मौसम में उगाया जाता है और जो अत्यधिक पौष्टिक होता है। तथा ज्वार और बाजरा जो गर्मियों के दौरान उगाने के लिए उपयुक्त हैं और पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं।
मक्का प्रोटीन और रेशे (फाइबर से भरपूर जो पशुओं के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। सूखा चारा वह चारा है जो उस समय विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होता है जब हरे चारे की पर्याप्त उपलब्धता नहीं रहती। इस प्रकार के चारे को लंबी अवधि तक सुरक्षित रखकर भविष्य में उपयोग किया जा सकता है। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं सूखी घास गेहूँ और धान का भूसा तथा कड़बी जैसे गन्ने की सूखी पत्तियाँ मूँगफली के छिलके आदि। संकेंद्रित चारा एक ऐसा पौष्टिक आहार है जो अत्यधिक ऊर्जा और प्रोटीन से समृद्ध होता है और इसे विशेष रूप से दूध देने वाले पशुओं तथा गर्भवती पशुओं को खिलाया जाता है। इस श्रेणी में मुख्य रूप से दलहनी फसलें आती हैं जैसे अरहर चना और मूँग आदि। इसके अतिरिक्त तेल की खली भी इसी के अंतर्गत आती है जिसमें सरसों सोयाबीन और नारियल की खली प्रमुख हैं। अनाज वर्ग में मक्का जौ चावल और गेहूं जैसे दाने शामिल होते हैं जो पशुओं को भरपूर कैलोरी प्रदान करते हैं।
चारे का उचित प्रबंधन और भंडारण इसकी गुणवत्ता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। सही तरीके से संग्रहित करने पर चारे में नमी फफूंद और कीटों के प्रकोप से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है जिससे उसके पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं और उसे लंबी अवधि तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
चारा संग्रहण साइलेज यह हरे चारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की एक प्रभावी विधि है, जिसमें चारे को पूरी तरह से हवा-रहित वातावरण वाले गड्ढे या टंकी में दबाकर रखा जाता है, ताकि उसमें विद्यमान पोषक तत्वों का क्षय न हो और चारा वर्षों तक उपयोग योग्य बना रहे।
हे मेकिंग इस पद्धति में हरे चारे को धूप में सुखाकर उसकी नमी को कम किया जाता है और फिर उसे भंडारित किया जाता है। यह तरीका उन फसलों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है जैसे बरसीम और नेपियर घास, जिनमें सूखने के बाद भी पौष्टिकता बनी रहती है।
चारे के भंडारण के उचित उपाय सूखे चारे को नमी फफूंद और कीड़े-मकोड़ों के प्रकोप से बचाने के लिए उसे शुष्क साफ और हवादार स्थान पर रखना अत्यंत आवश्यक है। साइलेज को भलीभांति ढककर रखना चाहिए ताकि उसमें किसी भी प्रकार की फफूंद या सड़न उत्पन्न न हो सके। वहीं अनाज आधारित चारे की सुरक्षा के लिए प्लास्टिक के थैलों अथवा वायुरोधी पात्रों का प्रयोग करना लाभकारी रहता है जिससे उसकी गुणवत्ता और पोषण मूल्य लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं।
पशुओं के आहार में अपमिश्रण तथा उसके दुष्परिणाम
आजकल बाजार में चारे में मिलावट भी की जा रही है जिससे पशुओं की सेहत को निम्नलिखित गंभीर नुकसान हो सकते हैंः
ऽ पाचन तंत्र की समस्याः खराब गुणवत्ता वाले चारे के सेवन से पशुओं में पाचन संबंधी विकार, गैस्ट्रिक असुविधा तथा अन्य स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
ऽ दूध की गुणवत्ता में गिरावट: यदि किसी पशु को अशुद्ध या मिलावट वाला चारा खिलाया जाए, तो उसके दूध की गुणवत्ता में स्पष्ट गिरावट आ जाती है।
ऽ बीमारियों का खतरा: पशुओं को खिलाया जाने वाला रसायन-मिश्रित चारा उनके स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक और जानलेवा सिद्ध हो सकता है।
चारा पशुपालन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। इसकी गुणवत्ता और सुलभता का सीधा प्रभाव पशुओं के स्वास्थ्य, उनकी उत्पादन क्षमता और किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। किसानों को अपने पशुओं को संतुलित आहार और पोषक तत्वों से भरपूर चारा उपलब्ध कराने के साथ-साथ चारे के सुरक्षित और वैज्ञानिक ढंग से संग्रहण पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि पशु निरोगी बने रहें और उनसे अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सके। इसके अतिरिक्त, सरकार और पशुपालन विभाग का यह दायित्व है कि वे किसानों को चारे की खेती और उसके भंडारण की आधुनिक विधियों में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करें। यदि चारे का प्रबंधन सुनियोजित और सही पद्धति से किया जाए, तो इससे न केवल पशुपालन उद्योग को अधिक सुदृढ़ और समृद्ध बनाया जा सकता है, बल्कि किसानों की आमदनी में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। संतुलित चारा केवल पशुओं के लिए ही लाभकारी नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण कृषि क्षेत्र के समग्र विकास में भी एक महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाता है।

सफल पशुपालन में चारे का महत्व

डॉ. सोनू कुमार यादव, डॉ. राहुल चैरसिया
डॉ. अंजनी कुमार मिश्रा, डॉ. प्रमोद शर्मा
डॉ. भावना अहरवाल

  • टीचिंग एसोसिएट, पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, रीवा, मध्य प्रदेश
  • सहायक आचार्य, पशु चिकित्सा औषधि विभाग, आर.आर. पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय,देवली, टोंक, राजस्थान
  • प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग,पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय,रीवा, मध्य प्रदेश
  • सहायक प्राध्यापक शिक्षण पशुधन फार्म परिसर विभाग पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय जबलपुर मध्य प्रदेश
  • सहायक प्राध्यापक पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग,पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय, नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर, मध्य प्रदेश

पशुपालन भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अभिन्न हिस्सा है। पशुधन से हमें दूध मांस ऊन और चमड़े जैसे अनेक उपयोगी उत्पाद प्राप्त होते हैं, साथ ही इनसे खेती-बाड़ी के विभिन्न कार्यों में भी बहुमूल्य सहायता मिलती है। पशुओं के स्वास्थ्य तथा उनकी उत्पादन क्षमता को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए संतुलित एवं पोषक तत्वों से भरपूर आहार अत्यंत आवश्यक माना जाता है। पशुओं के शरीर को आवश्यक ऊर्जा, प्रोटीन खनिज और विटामिन प्रदान करने में चारा मूलभूत भूमिका निभाता है और यह केवल उनके पोषण की पूर्ति तक सीमित नहीं है बल्कि उनके समग्र स्वास्थ्य दूध के उत्पादन और शारीरिक एवं मानसिक विकास को भी गहराई से प्रभावित करता है। यदि पशुओं को समुचित और पर्याप्त पोषण उपलब्ध न हो तो उनके शरीर की रोगों से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता धीरे-धीरे घट जाती है जिसके परिणामस्वरूप वे जल्दी बीमार पड़ सकते हैं और उनकी दैनिक कार्यक्षमता तथा उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ता है। अतः पशुपालन में सफलता प्राप्त करने के लिए उपयुक्त चारे का सावधानीपूर्वक चयन करना और उसके भंडारण वितरण तथा प्रबंधन की उचित व्यवस्था करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
चारे का महत्व
पशुओं के लिए चारे की अहमियत को कई दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है। सबसे पहले पशुओं के स्वस्थ रहने के लिए उन्हें आवश्यक पोषण का मिलना अत्यंत जरूरी है। यदि पशुओं को उचित आहार उपलब्ध न हो तो वे धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं और उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है जिससे वे विभिन्न प्रकार की बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं। इसके अलावा चारे में प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट वसा खनिज लवण और विटामिन जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं जो पशुओं की शारीरिक वृद्धि ऊर्जा प्रजनन क्षमता और समग्र सेहत के लिए अनिवार्य हैं। जो पशुओं की पोषण संबंधी जरूरतों की पूर्ति करते हैं। संतुलित आहार ग्रहण करने से पशु निरोगी बने रहते हैं और उनकी रोगों से लड़ने की शक्ति में वृद्धि होती है। डेयरी व्यवसाय से जुड़े कृषक दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के उद्देश्य से अपने पशुओं के लिए उत्तम कोटि के चारे की व्यवस्था करना अनिवार्य समझते हैं। जब गाय और भैंस को पोषक तत्वों से भरपूर भोजन उपलब्ध कराया जाता है तो वे अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में दूध देती हैं और उस दूध में वसा का स्तर भी संतोषजनक बना रहता है। इस प्रकार श्रेष्ठ गुणवत्ता वाला चारा दुग्ध उत्पादन में वृद्धि लाने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाता है।
पशुओं की प्रजनन क्षमता में सुधार उत्तम गुणवत्ता वाले चारे के सेवन से पशुओं की प्रजनन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। पोषक तत्वों की कमी अर्थात कुपोषण की स्थिति में पशुओं को प्रजनन संबंधी अनेक कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके विपरीत पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित चारा देने से पशु समय पर गर्भधारण करते हैं और स्वस्थ सशक्त संतति को जन्म देते हैं।
कार्यक्षमता और शक्ति में वृद्धि जो कृषक बैलों और घोड़ों से खेती-बाड़ी के कार्यों अथवा माल-वाहन और आवागमन के लिए काम लेते हैं उनके लिए चारे का महत्व और भी अधिक हो जाता है। उचित और पौष्टिक आहार से इन पशुओं की शारीरिक कार्यक्षमता और ऊर्जा बढ़ती है जिससे वे भारी श्रम को सरलता से सहन कर पाते हैं और लंबे समय तक स्वस्थ एवं सक्रिय बने रहते हैं।
आर्थिक लाभ संतुलित चारा देने से पशुओं की उत्पादकता में निरंतर बढ़ोतरी होती है जिसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव पशुपालक के आर्थिक लाभ पर पड़ता है। दूध मांस ऊन अथवा श्रम जैसे विभिन्न उत्पादों में वृद्धि होने से किसान की आय बढ़ती है और पशुपालन एक लाभकारी व्यवसाय के रूप में और अधिक सुदृढ़ होता है। जिससे किसानों को अधिक लाभ होता है। पौष्टिक आहार मिलने से पशु कम रोगग्रस्त होते हैं और इसी कारण उनके इलाज पर होने वाला खर्च भी घट जाता है। साथ ही इससे दूध मांस और अन्य पशु-उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार आता है जिसके फलस्वरूप बाजार में उन्हें बेहतर दाम प्राप्त होते हैं।
चारे के प्रकार
चारा मुख्यतः तीन प्रकार का होता है। इनमें पहला है हरा चारा जिसे पशुओं के लिए सबसे अधिक पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है। इसमें जल की मात्रा अधिक पाई जाती है और यह पशुओं के शरीर को भरपूर ऊर्जा प्रदान करता है। हरे चारे की कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं नेपियर घास जो दुधारू पशुओं के लिए अत्यंत उत्तम चारा माना जाता है। बरसीम जिसे सर्दियों के मौसम में उगाया जाता है और जो अत्यधिक पौष्टिक होता है। तथा ज्वार और बाजरा जो गर्मियों के दौरान उगाने के लिए उपयुक्त हैं और पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं।
मक्का प्रोटीन और रेशे (फाइबर से भरपूर जो पशुओं के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। सूखा चारा वह चारा है जो उस समय विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होता है जब हरे चारे की पर्याप्त उपलब्धता नहीं रहती। इस प्रकार के चारे को लंबी अवधि तक सुरक्षित रखकर भविष्य में उपयोग किया जा सकता है। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं सूखी घास गेहूँ और धान का भूसा तथा कड़बी जैसे गन्ने की सूखी पत्तियाँ मूँगफली के छिलके आदि। संकेंद्रित चारा एक ऐसा पौष्टिक आहार है जो अत्यधिक ऊर्जा और प्रोटीन से समृद्ध होता है और इसे विशेष रूप से दूध देने वाले पशुओं तथा गर्भवती पशुओं को खिलाया जाता है। इस श्रेणी में मुख्य रूप से दलहनी फसलें आती हैं जैसे अरहर चना और मूँग आदि। इसके अतिरिक्त तेल की खली भी इसी के अंतर्गत आती है जिसमें सरसों सोयाबीन और नारियल की खली प्रमुख हैं। अनाज वर्ग में मक्का जौ चावल और गेहूं जैसे दाने शामिल होते हैं जो पशुओं को भरपूर कैलोरी प्रदान करते हैं।
चारे का उचित प्रबंधन और भंडारण इसकी गुणवत्ता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। सही तरीके से संग्रहित करने पर चारे में नमी फफूंद और कीटों के प्रकोप से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है जिससे उसके पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं और उसे लंबी अवधि तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
चारा संग्रहण साइलेज यह हरे चारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की एक प्रभावी विधि है, जिसमें चारे को पूरी तरह से हवा-रहित वातावरण वाले गड्ढे या टंकी में दबाकर रखा जाता है, ताकि उसमें विद्यमान पोषक तत्वों का क्षय न हो और चारा वर्षों तक उपयोग योग्य बना रहे।
हे मेकिंग इस पद्धति में हरे चारे को धूप में सुखाकर उसकी नमी को कम किया जाता है और फिर उसे भंडारित किया जाता है। यह तरीका उन फसलों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है जैसे बरसीम और नेपियर घास, जिनमें सूखने के बाद भी पौष्टिकता बनी रहती है।
चारे के भंडारण के उचित उपाय सूखे चारे को नमी फफूंद और कीड़े-मकोड़ों के प्रकोप से बचाने के लिए उसे शुष्क साफ और हवादार स्थान पर रखना अत्यंत आवश्यक है। साइलेज को भलीभांति ढककर रखना चाहिए ताकि उसमें किसी भी प्रकार की फफूंद या सड़न उत्पन्न न हो सके। वहीं अनाज आधारित चारे की सुरक्षा के लिए प्लास्टिक के थैलों अथवा वायुरोधी पात्रों का प्रयोग करना लाभकारी रहता है जिससे उसकी गुणवत्ता और पोषण मूल्य लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं।
पशुओं के आहार में अपमिश्रण तथा उसके दुष्परिणाम
आजकल बाजार में चारे में मिलावट भी की जा रही है जिससे पशुओं की सेहत को निम्नलिखित गंभीर नुकसान हो सकते हैंः
ऽ पाचन तंत्र की समस्याः खराब गुणवत्ता वाले चारे के सेवन से पशुओं में पाचन संबंधी विकार, गैस्ट्रिक असुविधा तथा अन्य स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
ऽ दूध की गुणवत्ता में गिरावट: यदि किसी पशु को अशुद्ध या मिलावट वाला चारा खिलाया जाए, तो उसके दूध की गुणवत्ता में स्पष्ट गिरावट आ जाती है।
ऽ बीमारियों का खतरा: पशुओं को खिलाया जाने वाला रसायन-मिश्रित चारा उनके स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक और जानलेवा सिद्ध हो सकता है।
चारा पशुपालन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। इसकी गुणवत्ता और सुलभता का सीधा प्रभाव पशुओं के स्वास्थ्य, उनकी उत्पादन क्षमता और किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। किसानों को अपने पशुओं को संतुलित आहार और पोषक तत्वों से भरपूर चारा उपलब्ध कराने के साथ-साथ चारे के सुरक्षित और वैज्ञानिक ढंग से संग्रहण पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि पशु निरोगी बने रहें और उनसे अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सके। इसके अतिरिक्त, सरकार और पशुपालन विभाग का यह दायित्व है कि वे किसानों को चारे की खेती और उसके भंडारण की आधुनिक विधियों में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करें। यदि चारे का प्रबंधन सुनियोजित और सही पद्धति से किया जाए, तो इससे न केवल पशुपालन उद्योग को अधिक सुदृढ़ और समृद्ध बनाया जा सकता है, बल्कि किसानों की आमदनी में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। संतुलित चारा केवल पशुओं के लिए ही लाभकारी नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण कृषि क्षेत्र के समग्र विकास में भी एक महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाता है।

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