टीकमगढ़, कृषि विज्ञान केंद्र, टीकमगढ़ के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.एस. किरार, वैज्ञानिक – डॉ. आर.के. प्रजापति, डॉ. एस.के. सिंह, डॉ. यू.एस. धाकड़, डॉ. एस.के. जाटव, डॉ. आई.डी. सिंह एवं जयपाल छिगारहा द्वारा द्वारा रबी फसलों जैसे – चना, मटर, मसूर, सरसों एवं गेहूं में मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक का मुख्य एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग करना चाहिए। इससे फसलों की लागत कम होगी साथ ही संतुलित उर्वरक से मिट्टी की गुणवत्ता भी अच्छी रहेगी। किसान भाई प्रतिवर्ष रासायनिक उर्वरकों को अदल-बदल कर उपयोग करें तो उत्पादन भी अच्छा होगा और कीड़े बीमारियों से फसल काफी हद तक सुरक्षित रहेगी। टीकमगढ़ के 90% किसान असंतुलित उर्वरक के रूप में डी.ए.पी. और यूरिया का उपयोग करते हैं जबकि दलहनी, तिलहनी, जौ एवं गेहूं में भी डी.ए.पी. के स्थान पर एन.पी.के. (12:32:16), अन्नदाता (एन.पी.के. सल्फर – 20:20:0:13) या ट्रिपल एस.पी., सिंगल सुपर फास्फेट एवं म्यूरिएट ऑफ पोटाश का वैज्ञानिकों की अनुशंसा के आधार पर उपयोग करना चाहिए। उर्वरक ट्रिपल एस.पी. में भी डी.ए.पी. के बराबर फॉस्फोरस 46%, कैल्शियम 15-17% पाया जाता है। किसान भाई सभी फसलों की बुवाई 15 नवंबर तक कर लेवे जिससे फसल की वानस्पतिक वृद्धि और पौधों में कंसे भी अधिक निकलते हैं और समय पर बुवाई करने से बीज दर भी अधिक नहीं डालना पड़ेगा। एक एकड़ गेहूं में एन.पी.के. की मात्रा 75 कि.ग्रा., यूरिया 75 कि.ग्रा. एवं म्यूरिएट ऑफ पोटाश 20-25 कि.ग्रा. या दूसरे विकल्प के रूप में गेहूं में ट्रिपल एस.पी. 50 कि.ग्रा., यूरिया 65 कि.ग्रा. एवं म्यूरिएट ऑफ पोटाश 20-25 कि.ग्रा. प्रति एकड़ या तीसरे विकल्प के रूप में गेहूं में सिंगल सुपर फास्फेट 150 कि.ग्रा., यूरिया 75 कि.ग्रा. प्रति एकड़ उपयोग करना चाहिए। ट्रिपल सुपर फास्फेट, अन्नदाता, सिंगल सुपर फास्फेट, एन.पी.के., म्यूरिएट ऑफ पोटाश, आदि उर्वरकों को बुवाई के समय उपयोग करें और यूरिया की मात्रा को तीन भागों में बांटकर देना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न प्रकार के जैव उर्वरक बनाये जाते हैं, इनका उपयोग भी फसल के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है।
रबी फसलों में संतुलित उर्वरक का उपयोग, उपज में वृद्धि
टीकमगढ़, कृषि विज्ञान केंद्र, टीकमगढ़ के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.एस. किरार, वैज्ञानिक – डॉ. आर.के. प्रजापति, डॉ. एस.के. सिंह, डॉ. यू.एस. धाकड़, डॉ. एस.के. जाटव, डॉ. आई.डी. सिंह एवं जयपाल छिगारहा द्वारा द्वारा रबी फसलों जैसे – चना, मटर, मसूर, सरसों एवं गेहूं में मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक का मुख्य एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग करना चाहिए। इससे फसलों की लागत कम होगी साथ ही संतुलित उर्वरक से मिट्टी की गुणवत्ता भी अच्छी रहेगी। किसान भाई प्रतिवर्ष रासायनिक उर्वरकों को अदल-बदल कर उपयोग करें तो उत्पादन भी अच्छा होगा और कीड़े बीमारियों से फसल काफी हद तक सुरक्षित रहेगी। टीकमगढ़ के 90% किसान असंतुलित उर्वरक के रूप में डी.ए.पी. और यूरिया का उपयोग करते हैं जबकि दलहनी, तिलहनी, जौ एवं गेहूं में भी डी.ए.पी. के स्थान पर एन.पी.के. (12:32:16), अन्नदाता (एन.पी.के. सल्फर – 20:20:0:13) या ट्रिपल एस.पी., सिंगल सुपर फास्फेट एवं म्यूरिएट ऑफ पोटाश का वैज्ञानिकों की अनुशंसा के आधार पर उपयोग करना चाहिए। उर्वरक ट्रिपल एस.पी. में भी डी.ए.पी. के बराबर फॉस्फोरस 46%, कैल्शियम 15-17% पाया जाता है। किसान भाई सभी फसलों की बुवाई 15 नवंबर तक कर लेवे जिससे फसल की वानस्पतिक वृद्धि और पौधों में कंसे भी अधिक निकलते हैं और समय पर बुवाई करने से बीज दर भी अधिक नहीं डालना पड़ेगा। एक एकड़ गेहूं में एन.पी.के. की मात्रा 75 कि.ग्रा., यूरिया 75 कि.ग्रा. एवं म्यूरिएट ऑफ पोटाश 20-25 कि.ग्रा. या दूसरे विकल्प के रूप में गेहूं में ट्रिपल एस.पी. 50 कि.ग्रा., यूरिया 65 कि.ग्रा. एवं म्यूरिएट ऑफ पोटाश 20-25 कि.ग्रा. प्रति एकड़ या तीसरे विकल्प के रूप में गेहूं में सिंगल सुपर फास्फेट 150 कि.ग्रा., यूरिया 75 कि.ग्रा. प्रति एकड़ उपयोग करना चाहिए। ट्रिपल सुपर फास्फेट, अन्नदाता, सिंगल सुपर फास्फेट, एन.पी.के., म्यूरिएट ऑफ पोटाश, आदि उर्वरकों को बुवाई के समय उपयोग करें और यूरिया की मात्रा को तीन भागों में बांटकर देना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न प्रकार के जैव उर्वरक बनाये जाते हैं, इनका उपयोग भी फसल के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है।
रबी फसलों में संतुलित उर्वरक का उपयोग, उपज में वृद्धि




