डॉ. सतेंद्र कुमार निरत, डॉ. भावना अग्रवाल, डॉ. अनिल नंदे, डॉ. पुनीत पटेल एवं डॉ. अनमिता शुक्ला
पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय, जबलपुर, मध्य प्रदेश
परिचय
पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास के साथ अनेक प्रकार के जीवों की भी उत्पत्ति हुई। इन्हीं जीवों में केंचुए भी शामिल हैं। केंचुए पूरी धरती पर विभिन्न स्थानों पर पाए जाते हैं। मुख्यतः ये जमीन की सतह पर या जमीन के नीचे रहते हैं। दोनों ही प्रकार से रहने के दौरान केंचुए कचरे एवं मिट्टी को खाकर उसके अवशिष्ट पदार्थ को खाद के रूप में पेड़-पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं। प्रकृति ने संभवतः मानव की बढ़ती आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यह व्यवस्था की है।
लाखों-करोड़ों वर्षों से पृथ्वी पर पेड़-पौधों के लिए उचित मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध कराने में केंचुओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विश्व में अब तक केंचुओं की लगभग 4200 से अधिक प्रजातियां पाई गई हैं। लगभग 50 वर्ष पहले तक, जब रासायनिक खाद का व्यापक विकास नहीं हुआ था, उस समय केंचुओं द्वारा बनाई गई खाद पेड़-पौधों को प्राकृतिक रूप से मिलती रही।
केंचुओं द्वारा प्राकृतिक रूप से की जाने वाली इस प्रक्रिया को लगभग 10-12 वर्ष पहले कृत्रिम तरीकों से अपनाया जाने लगा। इस कृत्रिम तरीके को वर्मीकल्चर कहा जाता है। केंचुए को अंग्रेजी में अर्थवर्म (Earthworm) कहा जाता है। अर्थवर्म द्वारा कृत्रिम कल्चर की प्रक्रिया के कारण इसका नाम वर्मीकल्चर पड़ा है।
गत वर्षों में रासायनिक खादों के उपयोग से होने वाले दुष्परिणामों को लेकर वैज्ञानिक चिंतित रहे हैं। अध्ययनों से यह पाया गया कि केंचुआ ऐसा जीव है जो ऐसी खाद तैयार कर सकता है, जो रासायनिक खाद के एक विकल्प के रूप में उपयोगी हो सकती है।
केंचुआ खाद (वर्मीकम्पोस्ट) क्या है?
वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित दशाओं में केंचुओं का पालन वर्मीकल्चर कहलाता है। केंचुओं से विकसित पदार्थ को वर्मीकास्ट कहा जाता है। अपघटनशील जैविक पदार्थों, जैसे भूसा, सूखी घास, पुआल, सब्जियों के अवशेष आदि को केंचुओं द्वारा खाकर एवं संसाधित करने से प्राप्त विकसित पदार्थ को वर्मीकम्पोस्ट या केंचुआ खाद कहा जाता है।
वर्मीकम्पोस्ट के लिए केंचुओं की मुख्य नस्ल
वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने के लिए मुख्य रूप से रेड वर्म प्रजाति के केंचुओं का उपयोग किया जाता है। इनमें सबसे लोकप्रिय नस्ल ‘एइसेनिया फोएटिडा’ (Eisenia fetida) है, जिसे ‘रेड विग्लर’ (Red Wiggler) भी कहा जाता है।
सामान्य देसी केंचुए केवल मिट्टी खाते हैं, जबकि लाल केंचुए या रेड वर्म गोबर और जैविक कचरे को तेजी से खाकर उसे उच्च गुणवत्ता वाली खाद, अर्थात वर्मीकम्पोस्ट में बदल देते हैं।
वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन विधि
खाद बनाने के लिए लगभग 3 फीट लंबा, 3 फीट चौड़ा तथा 2.5 फीट ऊंचा पिट तैयार किया जाता है। इसमें लगभग 2 फीट ऊंचाई तक 10-15 दिन पुराना गोबर भरा जाता है तथा लगभग 150 केंचुए छोड़ दिए जाते हैं।
गोबर के ऊपर 5-10 सेंटीमीटर पुआल अथवा सूखी पत्तियां डाल दी जाती हैं। इस इकाई में लगातार 20-25 दिन तक आवश्यकतानुसार पानी का छिड़काव किया जाता है। इसमें नमी बनाए रखना आवश्यक होता है।
लगभग 40-45 दिन बाद जब वर्मीकम्पोस्ट तैयार होने लगे तो 2-3 दिन तक पानी का छिड़काव बंद कर देना चाहिए। पिट को तेज धूप, बारिश और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने के लिए छप्पर से ढका जा सकता है।
जब खाद पकी हुई चाय की पत्ती जैसी दिखाई देने लगे, तो खाद को तैयार माना जा सकता है।
वर्मीकम्पोस्ट के लाभ
केंचुआ खाद के प्रयोग से सिंचाई में बचत हो सकती है। लगातार रासायनिक खादों के प्रयोग से कम हो रही मिट्टी की उर्वरक शक्ति को वर्मीकम्पोस्ट के उपयोग से बढ़ाने में सहायता मिलती है। वर्मीकम्पोस्ट के प्रयोग से फल, सब्जियों और अनाज की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है, जिससे किसानों को उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना रहती है। केंचुआ खाद में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव, हार्मोन्स तथा ह्यूमिक एसिड मिट्टी की दशा में सुधार करने में सहायक होते हैं। वर्मीकम्पोस्ट मिट्टी में सूक्ष्मजीवों को सक्रिय कर पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले पोषक तत्व उपलब्ध कराने में सहायक होता है। इसके उपयोग से फसल उत्पादन में वृद्धि हो सकती है।
उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में सहायता मिल सकती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन से रोजगार की संभावनाएं उपलब्ध हो सकती हैं। वर्मीकम्पोस्ट के उपयोग से रासायनिक खाद की मांग में कमी आ सकती है, जो राष्ट्र के अर्थतंत्र को सुदृढ़ बनाने में सहायक हो सकती है। इसके उपयोग से हानिकारक रासायनिक खादों एवं कीटनाशक दवाओं के उपयोग में कमी आने की संभावना रहती है, जिससे प्रदूषण में भी कमी हो सकती है। लगभग 90-100 दिनों में अच्छी गुणवत्ता वाली खाद तैयार हो सकती है।
पिट से खाद निकालना
तैयार खाद को पिट में एक तरफ एकत्र कर दें तथा दूसरी ओर फिर से नया गोबर भर दें। ऐसा करने से तैयार कम्पोस्ट में मौजूद केंचुए नए गोबर की ओर चले जाएंगे। इसके बाद खाद को पिट से निकालकर छाया में ढेर लगा दें। हल्का सूखने के बाद इसे 2 मिमी की छलनी से छान लें। छनी हुई खाद को बोरियों में भरकर रखा जा सकता है। तैयार खाद में लगभग 20-25 प्रतिशत नमी बनाए रखने का उल्लेख किया गया है। खाद को ऐसी जगह संग्रहित करें, जहां वह अत्यधिक सूख न सके।
वर्मीकम्पोस्ट में पाए जाने वाले तत्व
रासायनिक विशेषताएं
क्र.सं. पोषक तत्व मात्रा
1 कार्बनिक कार्बन (C) 9.15 से 17.98 प्रतिशत
2 नाइट्रोजन (N) 1.5 से 2.10 प्रतिशत
3 फॉस्फोरस (P) 1.0 से 1.50 प्रतिशत
4 पोटैशियम (K) 0.60 प्रतिशत
5 कैल्शियम (Ca) 22.00 से 70.00 m.e./100 g
6 मैग्नीशियम (Mg) 42.80 प्रतिशत
7 सल्फर (S) 128 से 548 ppm
8 कॉपर/तांबा (Cu) 100 ppm
9 आयरन/लोहा (Fe) 1800 ppm
10 जिंक/जस्ता (Zn) 50 ppm
वर्मीकम्पोस्ट बनाने की पद्धतियां एवं विधियां
वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन के लिए मुख्य रूप से दो पद्धतियों का उपयोग किया जाता है—
इनडोर पद्धति
आउटडोर पद्धति
केंचुआ खाद बनाने के लिए नमीयुक्त भूमि, कार्बनिक व्यर्थ पदार्थ तथा केंचुओं की आवश्यकता होती है।
क. इनडोर पद्धति: इनडोर पद्धति में किसी पक्के शेड, छप्पर या पेड़-पौधों की छाया में कार्बनिक पदार्थों का ढेर तैयार करके वर्मीकम्पोस्ट का उत्पादन किया जा सकता है। इस ढेर पर पानी का छिड़काव करने के उपरांत केंचुए छोड़ दिए जाते हैं। उपयुक्त नमी बनाए रखना आवश्यक होता है। केंचुए कार्बनिक व्यर्थ पदार्थ को खाकर मल त्याग करते हैं और उसी से वर्मीकम्पोस्ट तैयार होता है। हवा, तापमान, नमी एवं खाद्य पदार्थ की उपयुक्त परिस्थितियां केंचुओं के प्रजनन में सहायक होती हैं और अनुकूल परिस्थितियों में उनकी संख्या में वृद्धि भी होती है।
वर्मी बेड तैयार करने की विधि
वर्मीकम्पोस्ट के लिए वर्मी बेड तैयार करने हेतु निम्न चरणों का पालन किया जाता है—
प्रथम परत
टैंक अथवा क्यारी के फर्श पर लगभग 3 इंच मोटी पत्थर की बजरी, ईंट के छोटे टुकड़े तथा बालू-रेत के मिश्रण की परत बिछाएं। इसके बाद पानी का छिड़काव कर इसे नम करें।
प्रयोग की मात्रा
फलदार पेड़ों में आवश्यकतानुसार 1-10 किलोग्राम प्रति पेड़ वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग करें। सब्जी की फसलों में 6-8 क्विंटल प्रति बीघा प्रयोग का उल्लेख किया गया है। किचन गार्डन तथा गमलों हेतु लगभग 100 ग्राम प्रति गमला प्रयोग किया जा सकता है। खाद्यान्न फसलों में 3-4 क्विंटल प्रति बीघा प्रयोग का उल्लेख किया गया है।
दूसरी परत
इसके ऊपर ऐसे सख्त कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों की परत बिछाएं, जिन्हें गलने-सड़ने तथा मुलायम होने में अधिक समय लगता है। इनमें—
कपास के सूखे तने, ज्वार-बाजरा के अवशेष, मक्का की कड़वी, धान का छिलका, गन्ने की खोई, बुरादा, नारियल की जटा आदि शामिल हैं। इन पदार्थों को अच्छी तरह पानी का छिड़काव कर नम करें। यह परत हार्ड बेड कहलाती है।
तीसरी परत
लगभग 2 इंच मोटी पूरी तरह विघटित कम्पोस्ट अथवा गोबर की सड़ी हुई खाद की परत बिछाएं। इस पर पानी का छिड़काव करके अच्छी तरह नम करें।
चौथी परत
सड़े हुए कम्पोस्ट की सतह पर केंचुओं सहित वर्मीकम्पोस्ट की पतली परत बिछाएं।
पांचवीं परत
सबसे ऊपर शीघ्र और आसानी से सड़ने-गलने योग्य कार्बनिक पदार्थों, जैसे गोबर अथवा गोबर गैस स्लरी तथा सूखे कार्बनिक अपशिष्टों का मिश्रण डालें। इस सामग्री का लगभग 15-20 दिन तक प्रारंभिक अपघटन हो चुका होना चाहिए। इस परत को लगभग 10-15 इंच मोटाई तक ढेर के रूप में लगाया जा सकता है। शुरू से अंत तक एक ही ढेर भी बनाया जा सकता है अथवा छोटे-छोटे अनेक ढेर एक-दूसरे से सटाकर बनाए जा सकते हैं। छोटे ढेरों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
छठवीं परत
सबसे ऊपर सूखी घास, पत्ते, भूसा, पुआल अथवा टाट के बोरे की मल्चिंग परत बिछाई जाती है। यह नमी बनाए रखने तथा केंचुओं की सक्रियता के लिए उपयुक्त सूक्ष्म वातावरण तैयार करने में सहायक होती है। इस विधि में नीचे बिछाई गई कंक्रीट, पत्थर या रेत की परत अतिरिक्त पानी के निकास का कार्य करती है। नीचे की हार्ड बेड परत खाद्य स्रोत के रूप में कार्य करती है।
ऊपर की भोजन सामग्री समाप्त हो जाने के बाद केंचुए नीचे की सतह में जाकर भोजन करते हैं, जहां अपघटन की प्रक्रिया धीमी होती है। नई खाद्य सामग्री डालने पर केंचुए पुनः ऊपर की आसानी से अपघटित होने वाली सामग्री की ओर आ जाते हैं।
इस प्रकार समय-समय पर ऊपर नई भोजन सामग्री डालते रहना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार लगभग 6 से 9 माह में एक बार क्यारी अथवा टैंक को खाली करके हार्ड बेड को नए सिरे से बिछाना चाहिए।
ख. आउटडोर पद्धति
यह खुले स्थानों में कम्पोस्ट बनाने की पद्धति है। इसका उपयोग प्रायः बगीचों में अथवा बड़े स्तर पर कम्पोस्ट तैयार करने के लिए किया जाता है। इस पद्धति में कम्पोस्टिंग जैविक अपशिष्ट के स्रोत के निकट ही की जाती है, जैसे बगीचे में पेड़ों एवं छायादार वृक्षों के आसपास। इससे जैविक अपशिष्ट के परिवहन और कम्पोस्ट तैयार करने में बचत हो सकती है। बगीचों में पेड़ों के चारों ओर उथले या गहरे स्थानों, बेसिन अथवा गड्ढों में जैविक अपशिष्ट से वर्मीकम्पोस्ट तैयार किया जा सकता है। बगीचे में उपलब्ध खुले स्थान का उपयोग ढेर विधि से कम्पोस्टिंग के लिए भी किया जा सकता है।
वर्मीकम्पोस्ट बनाने समय ध्यान रखने योग्य बातें
- स्थान का चयन
कम्पोस्ट यूनिट छायादार, ठंडी तथा पानी के जमाव से मुक्त स्थान पर बनाएं। - कच्चा पदार्थ
गोबर, फसल अवशेष, सूखी पत्तियां, घास आदि जैविक पदार्थों का उपयोग करें। - ताजा गोबर सीधे न डालें
ताजे गोबर में अधिक गर्मी हो सकती है, इसलिए इसे कुछ दिनों तक आंशिक रूप से सड़ने दें। - नमी बनाए रखें
बेड में उचित नमी बनाए रखना आवश्यक है। बहुत अधिक पानी से केंचुए मर सकते हैं और कम नमी में उनकी गतिविधि कम हो सकती है। - तापमान
कम्पोस्ट बेड का तापमान लगभग 20-30 डिग्री सेल्सियस रखना अच्छा बताया गया है। अत्यधिक गर्मी से केंचुओं को नुकसान हो सकता है। - पीएच
पीएच लगभग 6.5 से 7.5 के बीच रखने का उल्लेख किया गया है। - केंचुओं की सही प्रजाति
Eisenia fetida तथा Eudrilus eugeniae आदि उपयुक्त प्रजातियों का उपयोग किया जा सकता है। - धूप से बचाएं
केंचुओं को सीधी धूप और अत्यधिक गर्मी से बचाना आवश्यक है। - रासायनिक पदार्थ न डालें
कीटनाशक, खरपतवारनाशक, रासायनिक खाद, प्लास्टिक, कांच और धातु आदि को कम्पोस्ट में नहीं डालना चाहिए। - बेड को बहुत ज्यादा न दबाएं
सामग्री को ढीला रखें, ताकि वायु संचार बना रहे। - अधिक पानी न दें
पानी का उचित निकास होना चाहिए, ताकि बेड में पानी जमा न हो। - केंचुओं को भोजन उपलब्ध कराएं
जैविक पदार्थों को छोटे-छोटे टुकड़ों में डालने से केंचुओं द्वारा उनका अपघटन तेजी से हो सकता है। - समय-समय पर निगरानी करें
नमी, तापमान, दुर्गंध, केंचुओं की सक्रियता और कम्पोस्ट की स्थिति की नियमित जांच करें। - अत्यधिक अम्लीय या क्षारीय पदार्थों से बचें
बहुत अधिक अम्लीय पदार्थ केंचुओं के लिए हानिकारक हो सकते हैं। - तैयार वर्मीकम्पोस्ट की पहचान
तैयार कम्पोस्ट गहरे भूरे या काले रंग का, भुरभुरा तथा मिट्टी जैसी हल्की गंध वाला होता है। - कम्पोस्ट निकालते समय सावधानी
तैयार कम्पोस्ट निकालते समय केंचुओं को अलग कर लें, ताकि उन्हें दोबारा नए बेड में इस्तेमाल किया जा सके। - वर्मीकम्पोस्ट के विशेष गुण
- दानेदार प्रकृति के कारण वर्मीकम्पोस्ट भूमि के वायु परिसंचरण और जल धारण क्षमता में सुधार करने के साथ पेड़-पौधों में जड़ों के विकास में सहायक होता है।
वर्मीकम्पोस्ट एंजाइमों की क्रिया से अपघटित जैविक पदार्थों का भुरभुरा एवं दानेदार समूह है।
केंचुए की श्लेष्मा के कारण वर्मीकम्पोस्ट में जैविक गुण पाए जाते हैं।
वर्मीकम्पोस्ट में अनेक जैव सक्रिय यौगिक, जैसे ऑक्सिन्स, जिबरेलिन्स, साइटोकाइनिन्स, विटामिन्स एवं अमीनो अम्ल पाए जाने का उल्लेख किया गया है, जो पौधों की बढ़वार, विकास, प्रजनन एवं उपज को प्रभावित करने में सक्षम हो सकते हैं।
केंचुए तथा उनसे जुड़े जीव अमोनिया, हाइड्रोजन सल्फाइड एवं मर्केप्टान्स जैसे रसायनों के विघटन में सहायक हो सकते हैं, जो कम्पोस्ट में दुर्गंध पैदा करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
केंचुआ खाद में अनेक प्रकार के ह्यूमिक एसिड पाए जाते हैं, जो पौधों की बढ़वार में सहायता करने के साथ भूमि की भौतिक दशा में सुधार करने में सहायक होते हैं।
वर्मीकम्पोस्ट में मनुष्य तथा पौधों को हानि पहुंचाने वाले रोगाणुओं की संख्या सामान्य कम्पोस्ट एवं रासायनिक खाद की अपेक्षा कम होने का उल्लेख किया गया है।
सामान्य खाद की तुलना में केंचुआ खाद का उत्पादन एवं भंडारण अपेक्षाकृत सरल बताया गया है।
इसके उपयोग से भूमि की उर्वरक शक्ति बढ़ाने में सहायता मिलती है।
वर्मीकम्पोस्ट के प्रयोग से भूमि की भौतिक एवं रासायनिक दशा में सुधार हो सकता है।
भूमि में पानी के रिसाव की क्षमता बढ़ने और जड़ों के अच्छे विकास में सहायता मिल सकती है।
भूमि में फॉस्फेट, पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि तत्वों की उपलब्धता बढ़ने का उल्लेख किया गया है।
पौधों की जड़ों के आसपास के क्षेत्र में केंचुओं द्वारा बनाई गई सुरंगें मिट्टी, पानी, पोषक तत्वों एवं सूक्ष्म तत्वों के उपयोग में सहायता कर सकती हैं।
केंचुओं द्वारा बनाई गई सुरंगों के कारण पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकती हैं।
गार्डन में वर्मीकम्पोस्ट का उपयोग
वर्मीकम्पोस्ट या केंचुआ खाद गार्डन के पौधों के लिए उपयोगी जैविक खाद है। यह मिट्टी को उपजाऊ बनाने, पौधों की जड़ों को मजबूत करने तथा नमी बनाए रखने में सहायक हो सकती है।
इसे छोटे गमलों से लेकर बड़े बगीचों तक आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। - उपयोग करने का तरीका
गमले की ऊपरी मिट्टी को हल्के हाथ से थोड़ा कुरेद लें।
छोटे गमले के लिए 2-3 बड़े चम्मच वर्मीकम्पोस्ट का उपयोग करें।
बड़े गमले के लिए लगभग 100-200 ग्राम खाद डालें।
खाद को मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें।
खाद डालने के बाद हल्का पानी अवश्य दें, ताकि पोषक तत्व जड़ों तक पहुंच सकें।
निष्कर्षतः, वर्मीकम्पोस्ट जैविक अपशिष्टों के उपयोग द्वारा तैयार की जाने वाली एक उपयोगी जैविक खाद है। इसके उत्पादन से खेतों और घरों में उपलब्ध गोबर, फसल अवशेष, सूखी पत्तियों तथा अन्य जैविक पदार्थों का उपयोग किया जा सकता है। उचित विधि, नमी, तापमान, छाया तथा केंचुओं की सक्रियता का ध्यान रखकर अच्छी गुणवत्ता का वर्मीकम्पोस्ट तैयार किया जा सकता है। इसका उपयोग खेती, फलदार पौधों, सब्जियों, खाद्यान्न फसलों, किचन गार्डन तथा गमलों में किया जा सकता है।




