भोपाल। कुटकी एक कम अवधि वाली फसल है जो सूखे और जलभराव दोनों को सहन कर सकती है। इसे भोजन और चारे के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है और यह भारत के पूर्वी घाटों में प्रचुर मात्रा में उगाई जाती है। इस फसल का विस्तार कई क्षेत्रों में फैला है, जिसमें आदिवासी लोग, श्रीलंका, नेपाल और म्यांमार शामिल हैं।
कुटकी के अलग अलग नाम
कुटकी का अंग्रेजी नाम लिटिल मिलेट, बंगाली में सामा, हिंदी में मौरिया, कुटकी,धवन, गुजराती में गाजरो, कुऱी, मराठी में सावा, कन्नड़ में समे, तेलुगु में सामुलु, तमिल में समै, उड़िया में सुआन
भारत में इसकी खेती मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में होती है, जबकि छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में भी इसकी पैदावार की जाती है। यह हर आयु वर्ग के लिए लाभकारी है, कब्ज़ से राहत दिलाने में मदद करती है और पेट से संबंधित समस्याओं का समाधान करती है।
कुटकी में पोषक तत्व
कुटकी के पोषक तत्वों में शरीर के कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने की क्षमता होती है, यह बच्चों की वृद्धि के लिए अनुकूल है और शरीर को मजबूत बनाती है। इसका जटिल कार्बोहाइड्रेट धीरे-धीरे पचता है, जो मधुमेह रोगियों के लिए लाभकारी होता है। कुटकी एक एन्टीआक्सीडेंट और पालीफेनोलस, फेनोलिक यौगिक, टैनिन, फ्लेवोनॉयड सीधे शरीर के पोषण से संबंधित नहीं है लेकिन डायबिटीज, हृदय रोग, मोतियाबिंद, कैंसर, सूजन और जठरांतर संबंधी समस्याओं जैसे रोगों में सहायता कर स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में उम्र बढ़ाने और चयापचय रोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लिटिल मिलेट पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थों में पाए जाने वाला पालीफेनोलस फाइटोकेमिकल्स का सबसे बड़ा समूह है और विभिन्न स्वास्थ्य लाभों से जुड़ा हुआ है।
कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होने के कारण इसको पूरी तरह से पचने के लिए शरीर को थोड़ा समय लगता है। बच्चों को भी अनाज को खिचड़ी या उबालकर चावल जैसा दिया जा सकता है जो बच्चों में भी पोषण की कमी को पूरा करता है। इसे एक स्वदेशी सुपर फूड भी कहा जाता है। लिटिल मिलेट में मैग्नीशियम की मात्रा होती है जो हृदय संबंधी रोगों के उपचार में भी उपयोगी है। इसमें विटामिन बी3 उपस्थित रहता है जो कोलेस्ट्रॉल को कम करने में प्रभावकारी होता है। यह फास्फोरस जैसे खनिज का भी स्रोत है जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।
इसमें 8.7 ग्राम प्रोटीन, 75 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 5.3 ग्राम वसा, और 9.3 मिलीग्राम आयरन प्रति 100 ग्राम अनाज होता है। उच्च फाइबर होने के कारण यह वसा के जमाव को कम करने में मदद करता है। इसके न्यूट्रास्युटिकल तत्वों में फिनोल, टैनिन और फाइटेट्स शामिल हैं।
कुटकी की प्रमुख उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं:
जवाहर कुटकी 4 (JK 4): यह एक प्रमुख किस्म है जो लगभग 75-80 दिनों में पक जाती है और 13-15 क्विंटल/हेक्टेयर तक की औसत उपज देती है।
जवाहर कुटकी 1 (JK 1 / डिण्डौरी-1): यह 75-80 दिनों की अवधि में तैयार होती है और 8-10 क्विंटल/हेक्टेयर उपज देती है।
जवाहर कुटकी 2 (JK 2 / डिण्डौरी-2): यह भी 75-80 दिनों में पकने वाली किस्म है, जिसकी उपज 8-10 क्विंटल/हेक्टेयर है।
जवाहर कुटकी 8 (JK 8): यह किस्म 80-82 दिनों में परिपक्व होती है और 8-10 क्विंटल/हेक्टेयर की उपज देती है।
एटीएल 2 (TNPM 238): यह एक विशिष्ट किस्म है जो बेहतर उत्पादन के लिए जानी जाती है
खेती के लिए उचित जलवायु
भारत में कुटकी की खेती बड़े पैमाने पर नहीं होती। यह फसल सूखे और पानी दोनों की परिस्थिति में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है, और 2000 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में भी उगाई जा सकती है। यह फसल 10 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान सहन नहीं कर पाती और गर्मी के मौसम में उगाई जाती है।
उपयुक्त मिट्टी
कुटकी को विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है, जैसे रेतीली दोमट या काली कपास मिट्टी। हालांकि, उपजाऊ और कार्बनिक पदार्थों से भरपूर दोमट मिट्टी को प्राथमिकता दी जाती है। यह फसल लवणता और क्षारीयता सहन करने में सक्षम है।
बुवाई का समय और विधि
खरीफ सीजन में इसकी बुवाई जुलाई के पहले पखवाड़े में की जाती है, जो वर्षा पर आधारित होती है। रबी सीजन में तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में सितंबर-अक्टूबर के बीच बुवाई होती है, जबकि गर्मी के समय मई में बिहार और उत्तर प्रदेश में बुवाई की जाती है। बुवाई के दौरान पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25-30 से.मी. रखी जाती है और बीजों को 2-3 से.मी. गहराई तक बोया जाता है। पंक्ति बुवाई के लिए बीज की मात्रा 5-4 कि.ग्रा./एकड़ और प्रसारण बुवाई के लिए 8-10 कि.ग्रा./एकड़ होती है।
खाद और उर्वरक प्रबंधन
खाद और उर्वरक प्रबंधन के लिए प्रति एकड़ 4-5 टन कम्पोस्ट या गोबर की खाद का उपयोग किया जाता है। फसल में 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 12 किलोग्राम फॉस्फोरस और 8 किलोग्राम पोटाश का उपयोग किया जाता है। आधी नाइट्रोजन बुवाई के समय और शेष सिंचाई के समय दी जाती है।
परिपक्वता अवधि
कटाई बुवाई के 65-75 दिन बाद की जाती है, जब बालियां परिपक्व हो जाती हैं। एक अच्छी फसल से प्रति एकड़ 8-10 क्विंटल अनाज और 15-18 क्विंटल पुआल की उपज प्राप्त होती है।




