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बकरी से इंसानों में फैलने वाले रोग: बचाव के उपाय और विशेषज्ञों की जरूरी सलाह

डॉ. अनीता तिवारी, डॉ कंचन वालवडकर
डॉ सुलोचना , डॉ योगेश चतुर
पशुजन स्वास्थ्य एवं महामारी विभाग, पशु चिकित्सा विज्ञान
पशु आनुवंशिकी एवम प्रजनन विभाग,
पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, रीवा

बकरी पालन ग्रामीण भारत में आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन है। कम लागत, तेज़ी से प्रजनन क्षमता तथा सीमित संसाधनों में पालन की सुविधा के कारण इसे “गरीबों की गाय” भी कहा जाता है। बकरी का दूध, मांस और खाद किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन यदि पशुओं की उचित देखभाल, स्वच्छता और स्वास्थ्य प्रबंधन पर ध्यान न दिया जाए, तो कुछ संक्रामक रोग बकरियों से मनुष्यों में भी फैल सकते हैं। ऐसे रोगों को ज़ूनोटिक (Zoonotic) रोग कहा जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, मनुष्यों में उभरने वाले अधिकांश नए संक्रामक रोग पशुओं से ही उत्पन्न होते हैं। इसलिए बकरी पालन करते समय पशु एवं मानव दोनों के स्वास्थ्य की सुरक्षा आवश्यक है ।

ज़ूनोटिक रोग क्या हैं?

ज़ूनोटिक रोग वे संक्रामक रोग हैं जो पशुओं से मनुष्यों या मनुष्यों से पशुओं में फैल सकते हैं। संक्रमण सीधे संपर्क, कच्चे दूध, अधपके मांस, दूषित पानी, प्रसव के दौरान निकलने वाले पदार्थों या संक्रमित वातावरण के माध्यम से हो सकता है।
बकरियों से मनुष्यों में फैलने वाले प्रमुख रोग

  1. रेबीज़ (Rabies): रेबीज़ एक घातक वायरल रोग है, जो संक्रमित जानवर के काटने या उसकी लार के खुले घाव से संपर्क में आने पर फैल सकता है। एक बार लक्षण दिखाई देने के बाद इसका उपचार लगभग असंभव होता है।
    मुख्य लक्षण: तेज बुखार, बेचैनी और भ्रम, पानी से डर लगना, तंत्रिका तंत्र प्रभावित होना
    बचाव
    किसी भी जानवर के काटने पर घाव को 15 मिनट तक साबुन और बहते पानी से धोएँ।
    तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें।
    संदिग्ध पशु की जांच पशु चिकित्सक से कराएँ।
  2. ब्रुसेलोसिस (Brucellosis): यह एक गंभीर जीवाणुजनित रोग है, जो संक्रमित बकरी के कच्चे दूध, अधपके मांस या प्रसव के समय निकलने वाले पदार्थों के संपर्क से फैलता है।
    मनुष्यों में लक्षण: बार-बार बुखार आना, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, अत्यधिक कमजोरी, लंबे समय तक बीमारी बने रहना
    पशुओं में लक्षण: बार-बार गर्भपात, बांझपन, दूध उत्पादन में कमी
    बचाव
    हमेशा उबला या पाश्चुरीकृत दूध ही पिएँ।
    प्रसव कराते समय दस्ताने पहनें।
    गर्भपात करने वाले पशुओं की तुरंत जांच कराएँ।
  3. ऑर्फ (Orf): यह एक वायरल त्वचा रोग है जो मुख्यतः बकरी और भेड़ में होता है। संक्रमित पशु के मुंह या त्वचा पर बने घावों को छूने से मनुष्यों के हाथों पर भी दर्दयुक्त घाव बन सकते हैं।
    बचाव
    संक्रमित पशु को अलग रखें।
    घावों को नंगे हाथों से न छुएँ।
    दस्ताने पहनकर ही उपचार करें।
  4. खुजली (सरकोप्टिक मैन्ज): यह त्वचा में रहने वाले सूक्ष्म घुन (माइट) के कारण होने वाला रोग है।
    मुख्य लक्षण: तीव्र खुजली, पपड़ी बनना, बाल झड़ना, त्वचा मोटी होना
    बचाव
    संक्रमित पशु का शीघ्र उपचार कराएँ।
    पशु को संभालने के बाद हाथ साबुन से धोएँ।
    पशुशाला की नियमित सफाई करें।
  5. दाद (Ringworm): यह फफूंद (फंगस) से होने वाला त्वचा रोग है, जो संक्रमित पशु की त्वचा, बाल या उपकरणों के माध्यम से मनुष्यों में फैल सकता है।
    मुख्य लक्षण: गोलाकार लाल धब्बे, खुजली, त्वचा का छिलना
    बचाव
    संक्रमित पशु को अलग रखें।
    ब्रश, रस्सी और अन्य उपकरणों को नियमित रूप से साफ एवं कीटाणुरहित करें।
  6. क्लैमाइडियोसिस: यह रोग मुख्यतः गर्भपात करने वाली बकरियों से फैलता है। संक्रमित गर्भनाल, भ्रूण या प्रसव सामग्री के संपर्क में आने से मनुष्य संक्रमित हो सकता है।
    विशेष सावधानी: गर्भवती महिलाओं को ऐसे पशुओं के संपर्क से बचना चाहिए।
  7. लिस्टिरियोसिस: यह रोग लिस्टेरिया नामक जीवाणु से होता है। संक्रमण मुख्यतः कच्चे दूध तथा दूषित दुग्ध उत्पादों के सेवन से फैलता है।
    बचाव
    हमेशा उबला हुआ दूध पिएँ।
    साफ-सुथरे एवं सुरक्षित दुग्ध उत्पादों का ही उपयोग करें।
  8. सैल्मोनेला संक्रमण: यह रोग दूषित दूध, मांस या संक्रमित पशुओं के मल के संपर्क से फैल सकता है।
    मुख्य लक्षण: दस्त, बुखार, पेट दर्द, उल्टी
    बचाव
    भोजन अच्छी तरह पकाकर खाएँ।
    हाथों की स्वच्छता बनाए रखें।
  9. क्यू फीवर (Q Fever): यह रोग संक्रमित बकरियों के प्रसव के दौरान निकलने वाले पदार्थों तथा दूषित धूल के कणों के माध्यम से फैलता है।
    मुख्य लक्षण: तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द, अत्यधिक थकान, गर्भवती महिलाओं में यह गर्भपात का कारण भी बन सकता है।
    बचाव ही सबसे अच्छा उपचार: बकरियों से मनुष्यों में फैलने वाले अधिकांश संक्रमणों से कुछ सरल सावधानियाँ अपनाकर आसानी से बचा जा सकता है।
    पशुओं का नियमित टीकाकरण एवं कृमिनाशन कराएँ।
    पशुशाला को प्रतिदिन साफ रखें और समय-समय पर कीटाणुनाशक का छिड़काव करें।
    बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें।
    हमेशा उबला या पाश्चुरीकृत दूध ही उपयोग करें।
    प्रसव कराते समय दस्ताने, मास्क एवं एप्रन पहनें।
    पशुओं को छूने के बाद साबुन से हाथ अवश्य धोएँ।
    मृत पशुओं का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करें।
    किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।

इन बातों का हमेशा ध्यान रखें:

  1. कच्चा दूध या अधपका मांस न खाएँ।
    बीमार पशु को स्वस्थ झुंड के साथ न रखें।
    बिना दस्ताने के गर्भपात या प्रसव सामग्री को न छुएँ।
    पशुओं का उपचार बिना पशु चिकित्सक की सलाह के न करें।
    संक्रमित पशु के दूध का सेवन न करें।
    पशुशाला में गंदगी और नमी जमा न होने दें।
    बच्चों और गर्भवती महिलाओं को बीमार पशुओं के संपर्क में न आने दें।
    निष्कर्ष
    बकरी पालन तभी लाभदायक और सुरक्षित है जब पशुओं के स्वास्थ्य के साथ-साथ परिवार के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाए। याद रखें “स्वच्छ पशुशाला, स्वस्थ पशु और जागरूक किसान—यही सुरक्षित बकरी पालन और स्वस्थ परिवार की पहचान है। अधिकांश ज़ूनोटिक रोगों से केवल थोड़ी-सी सावधानी, नियमित टीकाकरण, स्वच्छता तथा समय पर पशु चिकित्सकीय परामर्श द्वारा आसानी से बचा जा सकता है। यदि किसी पशु में बार-बार गर्भपात, तेज बुखार, त्वचा पर घाव, अत्यधिक खुजली या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो स्वयं उपचार करने के बजाय तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें। स्वस्थ पशु ही स्वस्थ परिवार और समृद्ध किसान की पहचान हैं।

बकरी से इंसानों में फैलने वाले रोग: बचाव के उपाय और विशेषज्ञों की जरूरी सलाह

डॉ. अनीता तिवारी, डॉ कंचन वालवडकर
डॉ सुलोचना , डॉ योगेश चतुर
पशुजन स्वास्थ्य एवं महामारी विभाग, पशु चिकित्सा विज्ञान
पशु आनुवंशिकी एवम प्रजनन विभाग,
पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, रीवा

बकरी पालन ग्रामीण भारत में आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन है। कम लागत, तेज़ी से प्रजनन क्षमता तथा सीमित संसाधनों में पालन की सुविधा के कारण इसे “गरीबों की गाय” भी कहा जाता है। बकरी का दूध, मांस और खाद किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन यदि पशुओं की उचित देखभाल, स्वच्छता और स्वास्थ्य प्रबंधन पर ध्यान न दिया जाए, तो कुछ संक्रामक रोग बकरियों से मनुष्यों में भी फैल सकते हैं। ऐसे रोगों को ज़ूनोटिक (Zoonotic) रोग कहा जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, मनुष्यों में उभरने वाले अधिकांश नए संक्रामक रोग पशुओं से ही उत्पन्न होते हैं। इसलिए बकरी पालन करते समय पशु एवं मानव दोनों के स्वास्थ्य की सुरक्षा आवश्यक है ।

ज़ूनोटिक रोग क्या हैं?

ज़ूनोटिक रोग वे संक्रामक रोग हैं जो पशुओं से मनुष्यों या मनुष्यों से पशुओं में फैल सकते हैं। संक्रमण सीधे संपर्क, कच्चे दूध, अधपके मांस, दूषित पानी, प्रसव के दौरान निकलने वाले पदार्थों या संक्रमित वातावरण के माध्यम से हो सकता है।
बकरियों से मनुष्यों में फैलने वाले प्रमुख रोग

  1. रेबीज़ (Rabies): रेबीज़ एक घातक वायरल रोग है, जो संक्रमित जानवर के काटने या उसकी लार के खुले घाव से संपर्क में आने पर फैल सकता है। एक बार लक्षण दिखाई देने के बाद इसका उपचार लगभग असंभव होता है।
    मुख्य लक्षण: तेज बुखार, बेचैनी और भ्रम, पानी से डर लगना, तंत्रिका तंत्र प्रभावित होना
    बचाव
    किसी भी जानवर के काटने पर घाव को 15 मिनट तक साबुन और बहते पानी से धोएँ।
    तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें।
    संदिग्ध पशु की जांच पशु चिकित्सक से कराएँ।
  2. ब्रुसेलोसिस (Brucellosis): यह एक गंभीर जीवाणुजनित रोग है, जो संक्रमित बकरी के कच्चे दूध, अधपके मांस या प्रसव के समय निकलने वाले पदार्थों के संपर्क से फैलता है।
    मनुष्यों में लक्षण: बार-बार बुखार आना, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, अत्यधिक कमजोरी, लंबे समय तक बीमारी बने रहना
    पशुओं में लक्षण: बार-बार गर्भपात, बांझपन, दूध उत्पादन में कमी
    बचाव
    हमेशा उबला या पाश्चुरीकृत दूध ही पिएँ।
    प्रसव कराते समय दस्ताने पहनें।
    गर्भपात करने वाले पशुओं की तुरंत जांच कराएँ।
  3. ऑर्फ (Orf): यह एक वायरल त्वचा रोग है जो मुख्यतः बकरी और भेड़ में होता है। संक्रमित पशु के मुंह या त्वचा पर बने घावों को छूने से मनुष्यों के हाथों पर भी दर्दयुक्त घाव बन सकते हैं।
    बचाव
    संक्रमित पशु को अलग रखें।
    घावों को नंगे हाथों से न छुएँ।
    दस्ताने पहनकर ही उपचार करें।
  4. खुजली (सरकोप्टिक मैन्ज): यह त्वचा में रहने वाले सूक्ष्म घुन (माइट) के कारण होने वाला रोग है।
    मुख्य लक्षण: तीव्र खुजली, पपड़ी बनना, बाल झड़ना, त्वचा मोटी होना
    बचाव
    संक्रमित पशु का शीघ्र उपचार कराएँ।
    पशु को संभालने के बाद हाथ साबुन से धोएँ।
    पशुशाला की नियमित सफाई करें।
  5. दाद (Ringworm): यह फफूंद (फंगस) से होने वाला त्वचा रोग है, जो संक्रमित पशु की त्वचा, बाल या उपकरणों के माध्यम से मनुष्यों में फैल सकता है।
    मुख्य लक्षण: गोलाकार लाल धब्बे, खुजली, त्वचा का छिलना
    बचाव
    संक्रमित पशु को अलग रखें।
    ब्रश, रस्सी और अन्य उपकरणों को नियमित रूप से साफ एवं कीटाणुरहित करें।
  6. क्लैमाइडियोसिस: यह रोग मुख्यतः गर्भपात करने वाली बकरियों से फैलता है। संक्रमित गर्भनाल, भ्रूण या प्रसव सामग्री के संपर्क में आने से मनुष्य संक्रमित हो सकता है।
    विशेष सावधानी: गर्भवती महिलाओं को ऐसे पशुओं के संपर्क से बचना चाहिए।
  7. लिस्टिरियोसिस: यह रोग लिस्टेरिया नामक जीवाणु से होता है। संक्रमण मुख्यतः कच्चे दूध तथा दूषित दुग्ध उत्पादों के सेवन से फैलता है।
    बचाव
    हमेशा उबला हुआ दूध पिएँ।
    साफ-सुथरे एवं सुरक्षित दुग्ध उत्पादों का ही उपयोग करें।
  8. सैल्मोनेला संक्रमण: यह रोग दूषित दूध, मांस या संक्रमित पशुओं के मल के संपर्क से फैल सकता है।
    मुख्य लक्षण: दस्त, बुखार, पेट दर्द, उल्टी
    बचाव
    भोजन अच्छी तरह पकाकर खाएँ।
    हाथों की स्वच्छता बनाए रखें।
  9. क्यू फीवर (Q Fever): यह रोग संक्रमित बकरियों के प्रसव के दौरान निकलने वाले पदार्थों तथा दूषित धूल के कणों के माध्यम से फैलता है।
    मुख्य लक्षण: तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द, अत्यधिक थकान, गर्भवती महिलाओं में यह गर्भपात का कारण भी बन सकता है।
    बचाव ही सबसे अच्छा उपचार: बकरियों से मनुष्यों में फैलने वाले अधिकांश संक्रमणों से कुछ सरल सावधानियाँ अपनाकर आसानी से बचा जा सकता है।
    पशुओं का नियमित टीकाकरण एवं कृमिनाशन कराएँ।
    पशुशाला को प्रतिदिन साफ रखें और समय-समय पर कीटाणुनाशक का छिड़काव करें।
    बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें।
    हमेशा उबला या पाश्चुरीकृत दूध ही उपयोग करें।
    प्रसव कराते समय दस्ताने, मास्क एवं एप्रन पहनें।
    पशुओं को छूने के बाद साबुन से हाथ अवश्य धोएँ।
    मृत पशुओं का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करें।
    किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।

इन बातों का हमेशा ध्यान रखें:

  1. कच्चा दूध या अधपका मांस न खाएँ।
    बीमार पशु को स्वस्थ झुंड के साथ न रखें।
    बिना दस्ताने के गर्भपात या प्रसव सामग्री को न छुएँ।
    पशुओं का उपचार बिना पशु चिकित्सक की सलाह के न करें।
    संक्रमित पशु के दूध का सेवन न करें।
    पशुशाला में गंदगी और नमी जमा न होने दें।
    बच्चों और गर्भवती महिलाओं को बीमार पशुओं के संपर्क में न आने दें।
    निष्कर्ष
    बकरी पालन तभी लाभदायक और सुरक्षित है जब पशुओं के स्वास्थ्य के साथ-साथ परिवार के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाए। याद रखें “स्वच्छ पशुशाला, स्वस्थ पशु और जागरूक किसान—यही सुरक्षित बकरी पालन और स्वस्थ परिवार की पहचान है। अधिकांश ज़ूनोटिक रोगों से केवल थोड़ी-सी सावधानी, नियमित टीकाकरण, स्वच्छता तथा समय पर पशु चिकित्सकीय परामर्श द्वारा आसानी से बचा जा सकता है। यदि किसी पशु में बार-बार गर्भपात, तेज बुखार, त्वचा पर घाव, अत्यधिक खुजली या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो स्वयं उपचार करने के बजाय तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें। स्वस्थ पशु ही स्वस्थ परिवार और समृद्ध किसान की पहचान हैं।

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