डॉ. विपिन कुमार गुप्ता, डॉ. एस. पी. एस. परिहार, डॉ कमलेश कुमार खैरवाल, डॉ. शिव प्रकाश यादव एवं डॉ. आकाश सेंगर
पशु जन स्वास्थ्य एवं महामारी विज्ञान विभाग, पशु चिकित्सा एवं पशु पालन महाविद्यालय, महू नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर (म.प्र.)
मानव जीवन में पशुओं का महत्व प्राचीन काल से ही रहा है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। पशुओं से प्राप्त दूध, मांस एवं अंडे मानव आहार में उच्च गुणवत्ता वाले पशु प्रोटीन के प्रमुख स्रोत हैं। पशुओं में विभिन्न रोगों के उपचार एवं नियंत्रण के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया जाता है। डेयरी पशुओं में इनका प्रयोग विशेष रूप से थनैला (मास्टाइटिस) जैसे जीवाणुजनित रोगों के उपचार तथा संक्रमण की रोकथाम के लिए किया जाता है। हालांकि, एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक, अनावश्यक एवं अविवेकपूर्ण उपयोग से इनके अवशेष दूध में आ सकते हैं, जो मानव स्वास्थ्य तथा डेयरी उद्योग दोनों के लिए चिंता का विषय हैं।
पशुपालन में एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग
पशुओं में एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग मुख्यतः बीमारियों के उपचार, संक्रमण की रोकथाम तथा कुछ परिस्थितियों में पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादकता बनाए रखने के लिए किया जाता है। जब किसी पशु समूह में संक्रमण फैलने की संभावना होती है, तब संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए भी इनका उपयोग किया जा सकता है। वर्तमान समय में एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग पशु चिकित्सक की सलाह एवं निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार करना अत्यंत आवश्यक है।
यदि एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग निर्धारित मात्रा, अवधि या उद्देश्य के अनुसार नहीं किया जाता है, तो दूध में इनके अवशेष रह सकते हैं। इसके अतिरिक्त, उपचाराधीन पशुओं की उचित पहचान न करना तथा दवा की विदड्रॉल अवधि (Withdrawal Period) का पालन न करना भी दूध में एंटीबायोटिक अवशेषों की प्रमुख वजह है।
विदड्रॉल अवधि का महत्व
विदड्रॉल अवधि वह निर्धारित समय है, जिसके दौरान किसी दवा के प्रयोग के बाद संबंधित पशु से प्राप्त दूध या अन्य खाद्य उत्पादों का मानव उपभोग के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इस अवधि के दौरान दवा के अवशेष दूध में उपस्थित हो सकते हैं। प्रत्येक एंटीबायोटिक दवा के लिए विदड्रॉल अवधि अलग-अलग हो सकती है। इसलिए उपचार के बाद पशु का दूध तभी मानव उपभोग के लिए उपयोग किया जाना चाहिए, जब निर्धारित अवधि पूरी हो जाए। पशुपालकों को दवा के लेबल, पशु चिकित्सक की सलाह तथा संबंधित नियमों का अनिवार्य रूप से पालन करना चाहिए।
मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव
दूध में उपस्थित एंटीबायोटिक अवशेष मानव स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के प्रभाव डाल सकते हैं। प्रत्यक्ष रूप से इन अवशेषों के सेवन से कुछ संवेदनशील व्यक्तियों में एलर्जी एवं अन्य प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। लंबे समय तक अवशेषों के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य संबंधी अन्य समस्याओं की संभावना भी बढ़ सकती है।
एंटीबायोटिक अवशेषों का सबसे गंभीर अप्रत्यक्ष प्रभाव एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance) का बढ़ना है। एंटीबायोटिक दवाओं के अनुचित एवं अत्यधिक उपयोग के कारण कुछ जीवाणु इन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो सकते हैं। परिणामस्वरूप, सामान्य संक्रमणों के उपचार में प्रयुक्त दवाएँ कम प्रभावी हो सकती हैं। एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीवाणु पशुओं, मनुष्यों एवं पर्यावरण के बीच फैल सकते हैं और गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या उत्पन्न कर सकते हैं।
डेयरी उद्योग पर आर्थिक प्रभाव
दूध में एंटीबायोटिक अवशेष डेयरी उद्योग को भी प्रभावित कर सकते हैं। ये अवशेष दही, पनीर, लस्सी, छाछ एवं अन्य किण्वित दुग्ध उत्पादों के निर्माण में उपयोग किए जाने वाले लाभकारी सूक्ष्मजीवों या स्टार्टर कल्चर की गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। इससे उत्पादों की गुणवत्ता एवं उत्पादन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है तथा डेयरी उद्योग को आर्थिक नुकसान हो सकता है।
बचाव एवं रोकथाम
एंटीबायोटिक अवशेषों की समस्या को नियंत्रित करने के लिए डेयरी फार्म में पशुओं का वैज्ञानिक प्रबंधन आवश्यक है। रोगग्रस्त एवं उपचाराधीन पशुओं की उचित पहचान तथा उनका रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए। एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग केवल पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार और निर्धारित मात्रा में किया जाना चाहिए। उपचार के बाद विदड्रॉल अवधि का अनिवार्य रूप से पालन किया जाना चाहिए। दूध में एंटीबायोटिक अवशेषों की पहचान के लिए त्वरित एवं विश्वसनीय परीक्षण विधियों का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए।
अंततः, पशुपालकों एवं आम जनता में एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग तथा एंटीबायोटिक प्रतिरोध के प्रति जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। “एक स्वास्थ्य (One Health)” दृष्टिकोण अपनाकर मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच समन्वय स्थापित करना ही इस समस्या के प्रभावी नियंत्रण का महत्वपूर्ण उपाय है।




