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पशुजन्य खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेष: जनस्वास्थ्य की एक गंभीर चुनौती

डॉ. विपिन कुमार गुप्ता, डॉ. एस. पी. एस. परिहार, डॉ कमलेश कुमार खैरवाल, डॉ. शिव प्रकाश यादव एवं डॉ. आकाश सेंगर
पशु जन स्वास्थ्य एवं महामारी विज्ञान विभाग, पशु चिकित्सा एवं पशु पालन महाविद्यालय, महू नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर (म.प्र.)

आज के समय में पशुजन्य खाद्य पदार्थ हमारे दैनिक आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। दूध, मांस, अंडे तथा अन्य पशु उत्पाद उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, वसा, विटामिन एवं खनिजों के प्रमुख स्रोत हैं। ये पदार्थ मानव शरीर की पोषण संबंधी आवश्यकताओं, शारीरिक विकास तथा स्वस्थ जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। जैसे-जैसे लोगों की आय और जीवन स्तर में वृद्धि हो रही है, वैसे-वैसे पौष्टिक एवं उच्च गुणवत्ता वाले पशुजन्य खाद्य पदार्थों की मांग भी बढ़ रही है।
कृषि एवं पशुपालन में विभिन्न प्रकार के रसायनों का उपयोग उत्पादन बढ़ाने, पशुओं के रोगों एवं बाह्य परजीवियों के नियंत्रण तथा खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इनमें कीटनाशक, औषधियाँ, उर्वरक, परिरक्षक एवं अन्य रासायनिक पदार्थ शामिल हैं। इन रसायनों का अत्यधिक अथवा अनुचित उपयोग पर्यावरण, पशुओं और अंततः मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या उत्पन्न कर सकता है। विशेष चिंता का विषय इनके अवशेषों का खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करना है।

पशुजन्य खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों का प्रवेश

कीटनाशक एवं अन्य रसायन पशुओं के शरीर में मुख्यतः तीन मार्गों से पहुँच सकते हैं। पहला, दूषित चारा, पानी एवं अन्य खाद्य पदार्थों के सेवन से; दूसरा, पशुओं पर बाह्य परजीवियों के नियंत्रण के लिए कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से; तथा तीसरा, फसलों में रसायनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण खाद्य श्रृंखला के माध्यम से।
कुछ कीटनाशक, विशेष रूप से वसा में घुलनशील रसायन, पशुओं के शरीर में वसा ऊतकों में जमा हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप इनके अवशेष दूध, मांस एवं अंडों जैसे पशुजन्य खाद्य पदार्थों में पहुँच सकते हैं। ऑर्गेनोक्लोरीन समूह के कुछ कीटनाशक लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं और धीरे-धीरे विघटित होते हैं। इसलिए इनके अवशेष खाद्य श्रृंखला में लंबे समय तक बने रह सकते हैं।

मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

रासायनिक कीटनाशक अवशेषों का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव दो प्रकार का हो सकता है—तीव्र (अल्पकालिक) और दीर्घकालिक। अधिक मात्रा में अवशेषों के संपर्क में आने पर सिरदर्द, चक्कर, उल्टी, दस्त, कमजोरी, अत्यधिक लार आना, सांस लेने में कठिनाई, आंखों में धुंधलापन तथा मांसपेशियों में ऐंठन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
दीर्घकालिक एवं कम मात्रा में लगातार संपर्क से अधिक गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इनमें कैंसर, यकृत एवं गुर्दे की क्षति, तंत्रिका तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव, प्रतिरक्षा क्षमता में कमी तथा प्रजनन संबंधी विकार शामिल हैं। कुछ कीटनाशक न्यूरोटॉक्सिक प्रभाव उत्पन्न करते हैं तथा तंत्रिका तंत्र के सामान्य कार्य को प्रभावित कर सकते हैं। इनके कारण स्मरण शक्ति में कमी, शरीर की गतिविधियों में असंतुलन, प्रतिक्रिया समय में वृद्धि तथा गंभीर परिस्थितियों में पक्षाघात जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
कुछ रसायनों के लंबे समय तक संपर्क से प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है, जिससे व्यक्ति बार-बार संक्रमण का शिकार हो सकता है। इसके अतिरिक्त कुछ कीटनाशकों का संबंध कैंसर, भ्रूणीय विकृतियों तथा प्रजनन क्षमता में कमी से भी जोड़ा गया है।

भारत में समस्या के प्रमुख कारण

भारत में खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों की समस्या के प्रमुख कारणों में कीटनाशकों का अंधाधुंध एवं असंतुलित उपयोग, किसानों में जागरूकता एवं प्रशिक्षण की कमी, विस्तार सेवाओं की अपर्याप्तता, कीटनाशक निर्माताओं द्वारा उचित जानकारी का अभाव तथा अधिक उत्पादन एवं लाभ की इच्छा शामिल हैं। कुछ प्रतिबंधित या अत्यधिक विषैले कीटनाशकों का अनुचित उपयोग भी चिंता का विषय है।

बचाव एवं रोकथाम

इस समस्या से निपटने के लिए किसानों को कीटनाशकों के सुरक्षित एवं विवेकपूर्ण उपयोग के संबंध में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जैविक खेती, नीम, गोमूत्र एवं अन्य वनस्पति आधारित जैव-कीटनाशकों को बढ़ावा देना चाहिए। अत्यधिक विषैले एवं प्रतिबंधित कीटनाशकों के उत्पादन, बिक्री और उपयोग पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों की नियमित निगरानी एवं परीक्षण भी किया जाना चाहिए।
व्यक्तिगत स्तर पर फल एवं सब्जियों को साफ पानी से अच्छी तरह धोकर उपयोग करना चाहिए तथा जहाँ संभव हो, जैविक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस प्रकार वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, प्रभावी सरकारी नियंत्रण, किसान जागरूकता तथा “एक स्वास्थ्य (One Health)” दृष्टिकोण को अपनाकर पशुजन्य खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों से होने वाले स्वास्थ्य जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

पशुजन्य खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेष: जनस्वास्थ्य की एक गंभीर चुनौती

डॉ. विपिन कुमार गुप्ता, डॉ. एस. पी. एस. परिहार, डॉ कमलेश कुमार खैरवाल, डॉ. शिव प्रकाश यादव एवं डॉ. आकाश सेंगर
पशु जन स्वास्थ्य एवं महामारी विज्ञान विभाग, पशु चिकित्सा एवं पशु पालन महाविद्यालय, महू नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर (म.प्र.)

आज के समय में पशुजन्य खाद्य पदार्थ हमारे दैनिक आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। दूध, मांस, अंडे तथा अन्य पशु उत्पाद उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, वसा, विटामिन एवं खनिजों के प्रमुख स्रोत हैं। ये पदार्थ मानव शरीर की पोषण संबंधी आवश्यकताओं, शारीरिक विकास तथा स्वस्थ जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। जैसे-जैसे लोगों की आय और जीवन स्तर में वृद्धि हो रही है, वैसे-वैसे पौष्टिक एवं उच्च गुणवत्ता वाले पशुजन्य खाद्य पदार्थों की मांग भी बढ़ रही है।
कृषि एवं पशुपालन में विभिन्न प्रकार के रसायनों का उपयोग उत्पादन बढ़ाने, पशुओं के रोगों एवं बाह्य परजीवियों के नियंत्रण तथा खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इनमें कीटनाशक, औषधियाँ, उर्वरक, परिरक्षक एवं अन्य रासायनिक पदार्थ शामिल हैं। इन रसायनों का अत्यधिक अथवा अनुचित उपयोग पर्यावरण, पशुओं और अंततः मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या उत्पन्न कर सकता है। विशेष चिंता का विषय इनके अवशेषों का खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करना है।

पशुजन्य खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों का प्रवेश

कीटनाशक एवं अन्य रसायन पशुओं के शरीर में मुख्यतः तीन मार्गों से पहुँच सकते हैं। पहला, दूषित चारा, पानी एवं अन्य खाद्य पदार्थों के सेवन से; दूसरा, पशुओं पर बाह्य परजीवियों के नियंत्रण के लिए कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से; तथा तीसरा, फसलों में रसायनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण खाद्य श्रृंखला के माध्यम से।
कुछ कीटनाशक, विशेष रूप से वसा में घुलनशील रसायन, पशुओं के शरीर में वसा ऊतकों में जमा हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप इनके अवशेष दूध, मांस एवं अंडों जैसे पशुजन्य खाद्य पदार्थों में पहुँच सकते हैं। ऑर्गेनोक्लोरीन समूह के कुछ कीटनाशक लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं और धीरे-धीरे विघटित होते हैं। इसलिए इनके अवशेष खाद्य श्रृंखला में लंबे समय तक बने रह सकते हैं।

मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

रासायनिक कीटनाशक अवशेषों का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव दो प्रकार का हो सकता है—तीव्र (अल्पकालिक) और दीर्घकालिक। अधिक मात्रा में अवशेषों के संपर्क में आने पर सिरदर्द, चक्कर, उल्टी, दस्त, कमजोरी, अत्यधिक लार आना, सांस लेने में कठिनाई, आंखों में धुंधलापन तथा मांसपेशियों में ऐंठन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
दीर्घकालिक एवं कम मात्रा में लगातार संपर्क से अधिक गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इनमें कैंसर, यकृत एवं गुर्दे की क्षति, तंत्रिका तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव, प्रतिरक्षा क्षमता में कमी तथा प्रजनन संबंधी विकार शामिल हैं। कुछ कीटनाशक न्यूरोटॉक्सिक प्रभाव उत्पन्न करते हैं तथा तंत्रिका तंत्र के सामान्य कार्य को प्रभावित कर सकते हैं। इनके कारण स्मरण शक्ति में कमी, शरीर की गतिविधियों में असंतुलन, प्रतिक्रिया समय में वृद्धि तथा गंभीर परिस्थितियों में पक्षाघात जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
कुछ रसायनों के लंबे समय तक संपर्क से प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है, जिससे व्यक्ति बार-बार संक्रमण का शिकार हो सकता है। इसके अतिरिक्त कुछ कीटनाशकों का संबंध कैंसर, भ्रूणीय विकृतियों तथा प्रजनन क्षमता में कमी से भी जोड़ा गया है।

भारत में समस्या के प्रमुख कारण

भारत में खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों की समस्या के प्रमुख कारणों में कीटनाशकों का अंधाधुंध एवं असंतुलित उपयोग, किसानों में जागरूकता एवं प्रशिक्षण की कमी, विस्तार सेवाओं की अपर्याप्तता, कीटनाशक निर्माताओं द्वारा उचित जानकारी का अभाव तथा अधिक उत्पादन एवं लाभ की इच्छा शामिल हैं। कुछ प्रतिबंधित या अत्यधिक विषैले कीटनाशकों का अनुचित उपयोग भी चिंता का विषय है।

बचाव एवं रोकथाम

इस समस्या से निपटने के लिए किसानों को कीटनाशकों के सुरक्षित एवं विवेकपूर्ण उपयोग के संबंध में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जैविक खेती, नीम, गोमूत्र एवं अन्य वनस्पति आधारित जैव-कीटनाशकों को बढ़ावा देना चाहिए। अत्यधिक विषैले एवं प्रतिबंधित कीटनाशकों के उत्पादन, बिक्री और उपयोग पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों की नियमित निगरानी एवं परीक्षण भी किया जाना चाहिए।
व्यक्तिगत स्तर पर फल एवं सब्जियों को साफ पानी से अच्छी तरह धोकर उपयोग करना चाहिए तथा जहाँ संभव हो, जैविक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस प्रकार वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, प्रभावी सरकारी नियंत्रण, किसान जागरूकता तथा “एक स्वास्थ्य (One Health)” दृष्टिकोण को अपनाकर पशुजन्य खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों से होने वाले स्वास्थ्य जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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